Monday, October 26, 2026
Latest:
राष्ट्रीय

Explainer: सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (SUMP): रणनीतिक जरूरत बनाम स्थानीय आदिवासियों का वजूद 

Explainer: सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (SUMP): रणनीतिक जरूरत बनाम स्थानीय आदिवासियों का वजूद 

​अरुणाचल प्रदेश की 11,200 मेगावाट की सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (SUMP) वर्तमान में भारत की सबसे संवेदनशील और चर्चित परियोजनाओं में से एक बन गई है। यह विवाद केवल एक मेगा-डैम के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, भू-राजनीतिक दबाव और स्थानीय आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के बीच एक बड़ा वैचारिक व राजनीतिक संघर्ष बन चुका है।

​1. भू-राजनीतिक और रणनीतिक पहलू: चीन के ‘सुपर-डैम’ का मुकाबला

​केंद्र और राज्य सरकारों का मुख्य तर्क इस परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखने का है:

​तिब्बत का मेडोग प्रोजेक्ट: चीन द्वारा तिब्बत में ब्रह्मपुत्र (यारलुंग त्सांगपो) नदी पर 60,000 मेगावाट क्षमता का जो विशाल ‘सुपर-डैम’ (मेडोग हाइड्रोपॉवर प्रोजेक्ट) बनाया जा रहा है, वह भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक खतरा माना जा रहा है।

​जल-बफर (Water Buffer) की अनिवार्यता: अक्टूबर 2026 में अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चोवना मेन ने स्पष्ट किया था कि SUMP की तुलना केवल बिजली बनाने से नहीं की जा सकती। चीन का मेडोग प्रोजेक्ट जहां लगभग 5.5 अरब घन मीटर पानी रोक सकता है, वहीं भारत का यह प्रस्तावित SUMP डैम 9.2 अरब घन मीटर पानी स्टोर करने की क्षमता रखेगा।

​बचाव या नियंत्रण? सरकार का दावा है कि यदि चीन अचानक पानी छोड़ता है या बहाव में मनमानी करता है, तो यह भारतीय जलाशय एक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ या बफर का काम करेगा। हालांकि, भू-जल विशेषज्ञों का मानना है कि यह बांध भारत के भीतर जल प्रबंधन में मदद कर सकता है, लेकिन यह चीन के ऊपरी हिस्से में होने वाली गतिविधियों को प्रत्यक्ष रूप से रोक नहीं सकता।

​2. बाढ़ नियंत्रण और बिजली उत्पादन के दावे

​बाढ़ नियंत्रण की दुविधा: सरकार का तर्क है कि मानसून के दौरान सियांग और ब्रह्मपुत्र घाटी में आने वाली तबाही को यह बांध रोक सकता है। अतिरिक्त पानी को रोककर धीरे-धीरे छोड़ने की योजना है। हालांकि, विशेषज्ञों की चेतावनी है कि हिमालयी क्षेत्र में बादल फटने (Cloudburst) या अत्यधिक मानसूनी बारिश के समय यदि जलाशय पहले से भरा हुआ हो, तो यह बांध खुद एक बड़े खतरे में बदल सकता है।

​ऊर्जा सुरक्षा: 11,200 मेगावाट की क्षमता के साथ यह देश की सबसे बड़ी हाइड्रो प्रोजेक्ट्स में शामिल होगी, जिससे नेशनल ग्रिड को बड़ी मात्रा में स्वच्छ ऊर्जा और पूर्वोत्तर में आर्थिक विकास को गति मिलने की उम्मीद है। लेकिन इसकी वास्तविक ऊर्जा उत्पादन क्षमता मौसम के अनुसार पानी के प्राकृतिक बहाव पर निर्भर करेगी।

​3. स्थानीय आदिवासियों का विरोध और प्रमुख चिंताएं

​सरकार के रणनीतिक तर्कों के विपरीत, सियांग घाटी में रहने वाले ‘आदि’ समुदाय और अन्य स्थानीय निवासियों का गुस्सा पूरी तरह जायज और जमीनी चिंताओं पर आधारित है:

​विस्थापन और डूब क्षेत्र: आदिवासियों को डर है कि इस मेगा-डैम के कारण उनके 27 से अधिक पारंपरिक गांव, उपजाऊ कृषि भूमि और पुश्तैनी सांस्कृतिक स्थल हमेशा के लिए पानी में डूब जाएंगे।

​भूकंपीय संवेदनशीलता (Seismic Zone): पूर्वी हिमालयी बेल्ट दुनिया के सबसे संवेदनशील और सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में आता है। ऐसे हाई-रिस्क जोन में इतना बड़ा जलाशय बनाना किसी बड़े प्राकृतिक हादसे को खुला निमंत्रण दे सकता है।

​विश्वास की कमी: हालांकि सरकार का यह तर्क है कि अभी केवल ‘प्री-फीजिबिलिटी सर्वे’ और भूगर्भीय परीक्षण हो रहे हैं, स्थानीय लोगों को अंदेशा है कि एक बार प्रक्रिया शुरू होने के बाद उनकी आपत्तियों को दरकिनार कर दिया जाएगा।

​निष्कर्ष और आगे की राह

​चीन के साथ बढ़ते जल-तनाव (Water Wars) के दौर में भारत के लिए अपनी जल-सुरक्षा मजबूत करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए स्थानीय जनता की कीमत पर आगे बढ़ना दीर्घकालिक शांति के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

​इस संकट का समाधान केवल राजनीतिक या रणनीतिक दावों से नहीं, बल्कि पारदर्शी संवाद, स्वतंत्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA), और आदिवासियों के पुनर्वास व अधिकारों की ठोस गारंटी के साथ ही निकाला जा सकता है। जब तक स्थानीय लोगों का विश्वास नहीं जीता जाता, सियांग घाटी में यह विरोध ऐसे ही सुलगता रहेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *