शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘पूर्ण प्रतिबंध हमेशा नहीं देता अपेक्षित परिणाम, खड़े होते हैं गंभीर खतरे’
शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘पूर्ण प्रतिबंध हमेशा नहीं देता अपेक्षित परिणाम, खड़े होते हैं गंभीर खतरे’
देश में शराबबंदी को लेकर जारी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि शराब पर पूर्ण प्रतिबंध हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं देता और इसके कई गंभीर दुष्परिणाम भी सामने आ सकते हैं। कोर्ट ने गुजरात में वर्षों से लागू शराबबंदी के बावजूद जहरीली शराब से हुई त्रासदियों का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिबंध कई बार अवैध कारोबार को भूमिगत कर देता है, जिससे जनस्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था के समक्ष बड़े संकट खड़े होते हैं।
महाराष्ट्र के नियमों से जुड़े मामले पर सुनवाई
यह टिप्पणी ‘M/s Balaji Formalin Pvt. Ltd. बनाम भारत संघ’ मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ द्वारा की गई। अदालत महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B की वैधता पर विचार कर रही थी, जो मेथनॉल की खरीद, भंडारण और बिक्री को नियंत्रित करते थे तथा बिक्री से पहले उसमें विशेष रसायन मिलाने को अनिवार्य बनाते थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी नियम का उद्देश्य अच्छा होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके और घोषित उद्देश्य के बीच तार्किक व प्रभावी संबंध भी साबित होना चाहिए।
गुजरात का उदाहरण और शराबबंदी के पांच बड़े जोखिम
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात (एक ‘ड्राई स्टेट’) का जिक्र करते हुए कहा कि वहां लंबे समय से शराबबंदी लागू होने के बावजूद राज्य गठन के बाद से कम से कम 10 बड़ी जहरीली शराब की घटनाएं हुईं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रतिबंध से अवैध कारोबार समाप्त नहीं होता, बल्कि वह अधिक गुप्त और खतरनाक रूप ले लेता है।
अदालत ने पूर्ण शराबबंदी से जुड़े निम्नलिखित पांच प्रमुख जोखिमों का उल्लेख किया:
सरकार को मिलने वाले राजस्व में भारी कमी
प्रतिबंध को लागू कराने पर बढ़ने वाला प्रशासनिक खर्च
पुलिस और प्रवर्तन एजेंसियों में भ्रष्टाचार की संभावना
अवैध शराब निर्माण और तस्करी का विस्तार
नशीले पदार्थों और अन्य मादक द्रव्यों की समस्या में वृद्धि
मेथनॉल नियम असंवैधानिक करार और वैकल्पिक सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विवादित नियम 18A और 18B संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) के अनुरूप नहीं हैं, क्योंकि मेथनॉल में अनिवार्य रूप से रंग और कड़वाहट मिलाने की शर्त घोषित उद्देश्य से पर्याप्त रूप से जुड़ी नहीं थी। हालांकि, जनस्वास्थ्य की रक्षा को एक वैध उद्देश्य मानते हुए अदालत ने कुछ कड़े और व्यावहारिक विकल्प सुझाए:
लाइसेंसधारकों का कड़ा सत्यापन और स्टॉक का नियमित ऑडिट
मेथनॉल की खपत की निगरानी तथा उपयोग न होने वाले स्टॉक की वापसी
परिवहन-भंडारण पर कड़ी नजर और छेड़छाड़ रोकने वाली सील व्यवस्था
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण:
यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में शराबबंदी की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है, क्योंकि अदालत का मुख्य विचाराधीन विषय महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स में मेथनॉल से जुड़े प्रावधानों की वैधता की जांच करना था।
