मुंबई में ऑटो-कैब चालकों के लिए मराठी अनिवार्य करने का मामला हाई कोर्ट पहुंचा, अधिसूचना को दी गई चुनौती
मुंबई में ऑटो-कैब चालकों के लिए मराठी अनिवार्य करने का मामला हाई कोर्ट पहुंचा, अधिसूचना को दी गई चुनौती
मुंबई: मुंबई में ऑटो रिक्शा, टैक्सी और ऐप आधारित कैब चालकों के लिए मराठी भाषा का कार्यसाधक ज्ञान अनिवार्य किए जाने का मामला अब बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंच गया है। मंगलवार को अधिवक्ता विवेक शुक्ला के माध्यम से एक जनहित याचिका दायर कर महाराष्ट्र सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना को चुनौती दी गई।
याचिका में दावा किया गया है कि भाषा संबंधी यह अनिवार्यता चालकों के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है। मामले को बुधवार को तत्काल सुनवाई के लिए कार्यवाह मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे की पीठ के सामने मेंशन किए जाने की बात कही गई है।
सरकार की अधिसूचना को दी चुनौती
याचिका में महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले पर सवाल उठाया गया है, जिसके तहत ऑटो रिक्शा, टैक्सी और ऐप आधारित कैब चालकों के लिए मराठी भाषा का कार्यसाधक ज्ञान जरूरी किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले अधिकारों पर इसका असर पड़ सकता है। साथ ही, उनका कहना है कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने के लिए किसी विशेष भाषा के ज्ञान को अनिवार्य शर्त के रूप में निर्धारित नहीं किया गया है।
लाखों चालकों की आजीविका प्रभावित होने का दावा
याचिका में आशंका जताई गई है कि नियम का पालन नहीं करने वाले चालकों के बैज या परमिट पर कार्रवाई हो सकती है। इससे बड़ी संख्या में गरीब और प्रवासी चालकों की आजीविका प्रभावित होने का दावा किया गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भाषा सीखने की अनिवार्यता के चलते जिन चालकों के लिए निर्धारित समय में यह संभव नहीं हो पाया, उनके रोजगार पर संकट पैदा हो सकता है।
संजय निरुपम ने परिवहन मंत्री से की मुलाकात
इस बीच मराठी भाषा को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक से मुलाकात कर इस मुद्दे पर ज्ञापन सौंपा।
निरुपम ने कहा कि महाराष्ट्र में रहने वाले हर व्यक्ति को मराठी भाषा और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए। उनका कहना है कि लोगों को कम से कम मराठी की बुनियादी जानकारी हासिल करने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन नियम का पालन न कर पाने वाले चालकों के खिलाफ तुरंत कठोर कार्रवाई के वे पक्ष में नहीं हैं।
’85 फीसदी चालकों ने मराठी सीख ली’
निरुपम के मुताबिक, सरकार की ओर से चालकों को मराठी सीखने के लिए समय दिया गया था और बड़ी संख्या में चालकों ने इसमें रुचि दिखाई। उन्होंने दावा किया कि करीब 85 फीसदी ऑटो चालकों ने मराठी भाषा का ज्ञान हासिल कर लिया है।
हालांकि, उन्होंने कहा कि जो चालक अभी पीछे रह गए हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाय उनकी परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अब हाई कोर्ट के रुख पर नजर
भाषा, रोजगार और राज्य सरकार के नियमन से जुड़े इस विवाद पर अब बॉम्बे हाई कोर्ट के रुख का इंतजार है। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि व्यावसायिक वाहन चालकों के लिए स्थानीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने की सरकार की अधिसूचना कानूनी और संवैधानिक कसौटी पर कितनी टिकती है।
