Friday, July 3, 2026
राजनीति

पंजाब चुनाव से पहले कांग्रेस में फिर ‘गृहयुद्ध’: चन्नी ने खोला मोर्चा, राजा वडिंग के लिए राहुल गांधी को बताया ‘धृतराष्ट्र’

पंजाब चुनाव से पहले कांग्रेस में फिर ‘गृहयुद्ध’: चन्नी ने खोला मोर्चा, राजा वडिंग के लिए राहुल गांधी को बताया ‘धृतराष्ट्र’

​चंडीगढ़/नई दिल्ली: पंजाब विधानसभा चुनाव से लगभग आठ महीने पहले कांग्रेस के भीतर एक बार फिर बड़ा अंदरूनी संकट गहरा गया है. आलाकमान द्वारा अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बरकरार रखने के फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने बगावती तेवर अख्तियार कर लिए हैं. चन्नी के अलावा वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा भी नई टीम के एलान के बाद अपनी नाखुशी जाहिर कर चुके हैं.

​चन्नी के घर जुटी पंजाब कांग्रेस की विरोधी लॉबी, राहुल गांधी से मांगेंगे समय

​जालंधर से सांसद चरणजीत सिंह चन्नी के पंजाब स्थित आवास पर कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की एक अहम बैठक हुई.

​फैसले पर पुनर्विचार की मांग: सूत्रों के अनुसार, बैठक में तय किया गया कि राहुल गांधी के विदेश से लौटने के बाद उनसे मुलाकात का समय मांगा जाएगा और पंजाब को लेकर लिए गए फैसले पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया जाएगा.

​राहुल गांधी पर तीखा तंज: सूत्रों के मुताबिक, इस गुप्त बैठक में एक वरिष्ठ नेता ने यहाँ तक कह दिया कि राजा वडिंग को पद पर बनाए रखने के लिए राहुल गांधी ‘धृतराष्ट्र’ बन गए हैं और उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली है.

​सोशल मीडिया पर किया पोस्ट: बैठक के बाद चन्नी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कांग्रेस नेताओं ने मुलाकात कर पंजाब के लोगों की भावनाओं को आलाकमान तक पहुंचाने के लिए कहा है. चन्नी गुट का साफ कहना है कि राजा वडिंग के नेतृत्व में कांग्रेस आगामी चुनाव नहीं जीत सकती.

​आंतरिक सर्वे चन्नी के पक्ष में, फिर क्यों नहीं बदला ‘प्रधान’?

​दो दिन पहले कांग्रेस आलाकमान ने राजा वडिंग को अध्यक्ष बनाए रखने और चरणजीत सिंह चन्नी को कैंपेन कमेटी (प्रचार समिति) का प्रमुख बनाने का एलान किया था. चन्नी खुद प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते थे और पार्टी का आंतरिक सर्वे व अजय माकन कमेटी की रिपोर्ट भी चन्नी के पक्ष में थी. इसके बावजूद बदलाव न करने के पीछे कई वजहें रहीं:

​चुनाव से ठीक पहले असंतुलन का डर: नेतृत्व को लगा कि अब बदलाव के लिए बहुत देर हो चुकी है. जट सिख चेहरा होने के कारण राजा वडिंग (राजा बराड़) को हटाने से पार्टी को नुकसान हो सकता था. वडिंग को राहुल गांधी का बेहद करीबी माना जाता है.

​दलित फैक्टर बनाम जट सिख: पंजाब में करीब 33% दलित आबादी को साधने के लिए कई नेता चन्नी की पैरवी कर रहे थे. लेकिन विजय सिंगला जैसे हिंदू चेहरे और अन्य जट सिख नेताओं के बीच एक से ज्यादा दावेदार होने के कारण पेच फंस गया.

​ईडी के मामले: चन्नी पर चल रहे प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मामलों ने भी उनके दावे को कमजोर किया.

​आखिर में प्रियंका गांधी की सक्रियता के बाद सामूहिक नेतृत्व का संदेश देने के लिए सभी नेताओं को अलग-अलग कमेटियों में जिम्मेदारी दी गई. विजय सिंगला को चुनाव प्रबंधन, रंधावा को कोर कमेटी की कमान सौंपी गई और दो दलित व एक पिछड़े वर्ग के नेता को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया.

​रंधावा और मनीष तिवारी ने भी उठाए सवाल

​सुखजिंदर रंधावा की अमित शाह से मुलाकात: नई कमेटियों के एलान के तुरंत बाद गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की. हालांकि रंधावा ने इसे सीमापार आतंकवाद और कानून व्यवस्था से जुड़ी पूर्वनिर्धारित बैठक बताया, लेकिन इसकी टाइमिंग को लेकर कयास तेज हैं. रंधावा ने माना कि इतनी बैठकों के बाद भी नेताओं का असंतुष्ट रहना दुखद है और इससे पार्टी को नुकसान होगा.

​मनीष तिवारी का दर्द छलका: चंडीगढ़ के सांसद मनीष तिवारी को नई टीम में कोई जगह नहीं मिली और न ही उनसे कोई सलाह ली गई. उन्होंने तंज कसते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि कभी-कभी हुनर ही आपकी कमी बन जाता है और उन्हें दूसरों की असुरक्षा को दूर करना नहीं आता.

​2021 के इतिहास को दोहराने की राह पर कांग्रेस?

​यह पूरा घटनाक्रम 2021 के उस दौर की याद दिलाता है जब राहुल गांधी के कहने पर कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चन्नी को पहला दलित सीएम बनाया गया था और नवजोत सिंह सिद्धू को अध्यक्ष पद सौंपा गया था. उस समय सिद्धू की नाराजगी के चलते कांग्रेस चुनाव हार गई थी. अब 5 साल बाद वैसा ही गृहयुद्ध फिर शुरू हो गया है.

​पार्टी के हालात पर निराशा जताते हुए पंजाब कांग्रेस के ही एक नेता ने कहा, “क्या इस तरह हम भगवंत मान सरकार को चुनौती दे पाएंगे? जब सिद्धू का माहौल था तब पार्टी ने चन्नी को आगे कर दिया, अब चन्नी का माहौल है तो राजा वडिंग पर दांव लगा रहे हैं.” राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चन्नी की यह नाराजगी आगामी चुनावों में कांग्रेस को बहुत भारी पड़ सकती है.

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