राजनीति

बंगाल में सियासी भूचाल: ममता बनर्जी की विधायक दल की बैठक रद्द; 80 में से पहुंचे सिर्फ 20 विधायक, संकट में TMC

बंगाल में सियासी भूचाल: ममता बनर्जी की विधायक दल की बैठक रद्द; 80 में से पहुंचे सिर्फ 20 विधायक, संकट में TMC

​कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) का अंदरूनी संकट अब पूरी तरह खुलकर सामने आने लगा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर बुलाई गई टीएमसी विधायक दल की एक बेहद महत्वपूर्ण और आपातकालीन बैठक को उस समय रद्द करना पड़ा, जब पार्टी के 80 विधायकों में से महज 20 विधायक ही वहां पहुंचे। सूत्रों के मुताबिक, कोरम (न्यूनतम आवश्यक संख्या) पूरा नहीं होने की वजह से इस बैठक को स्थगित करना पड़ा। इसे टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व के लिए एक बहुत बड़ा राजनीतिक झटका और पार्टी के भीतर गहराते असंतोष के स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

​यह बैठक विधायक दल के नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय द्वारा बुलाई गई थी। दिलचस्प बात यह है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब महज 24 से 48 घंटे के भीतर ही टीएमसी के दो बड़े सांसदों—अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर हुए कथित हमलों को लेकर पार्टी सड़कों पर आक्रामक रुख अपनाए हुए है।

​ममता के घर खाली कुर्सियां, विधायकों ने बंद किए फोन

​टीएमसी के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि पार्टी के अधिकांश विधायकों ने जानबूझकर इस बैठक से दूरी बनाई। रविवार को बुलाई गई इस बैठक से पहले कई विधायक अचानक ‘संपर्क से बाहर’ (Out of Reach) हो गए, जबकि कुछ ने पार्टी नेतृत्व के फोन तक नहीं उठाए। एक मौजूदा विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें शनिवार को ही अभिषेक बनर्जी के स्टाफ की ओर से बैठक में शामिल होने का आधिकारिक फोन आया था, लेकिन इसके बावजूद 60 विधायकों का अनुपस्थित रहना बड़ी बगावत की ओर इशारा करता है।

​हालांकि बैठक में फिरहाद हकीम, नयना बंद्योपाध्याय, मदन मित्रा, असीमा पात्रा और कुनाल घोष जैसे गिने-चुने वरिष्ठ चेहरे जरूर मौजूद थे, लेकिन कुर्सियां खाली रहने से पार्टी की एकजुटता के दावों की हवा निकल गई है।

​कुणाल घोष का बचाव, विपक्ष का तीखा तंज

​TMC के राष्ट्रीय प्रवक्ता कुणाल घोष ने इस फजीहत पर पार्टी का बचाव करने की कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया कि अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी पर हुए हमलों के बाद राज्य में पैदा हुए तनाव और स्थानीय प्रदर्शनों में व्यस्त होने के कारण कई नेता समय पर कोलकाता नहीं पहुंच सके। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल एक ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिश मान रहे हैं।

​दूसरी तरफ, बीजेपी के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने टीएमसी की इस हालत पर तंज कसते हुए कहा, “तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह अंदर से ढह रही है। कट-मनी, भारी भ्रष्टाचार, अंदरूनी गुटबाजी और सत्ता के घमंड ने इस पार्टी को खत्म कर दिया है। अब इनके अपने विधायक ही इनका साथ छोड़ रहे हैं।”

​इस्तीफों और बयानों की झड़ी, बिखराव की कगार पर पार्टी!

​हाल के दिनों में टीएमसी के भीतर मची अंदरूनी कलह कई बड़े इस्तीफों और बयानों के बाद सार्वजनिक हो चुकी है:

​शांतनु सेन का इस्तीफा: वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनु सेन ने राष्ट्रीय प्रवक्ता के पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने चुनावी नतीजों के बाद सीधे नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि जनता का भरोसा अब पार्टी से पूरी तरह उठ चुका है।

​काकोली घोष दस्तिदार का विद्रोह: सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने पार्टी के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर अपनी ही पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी पर महिला सांसदों के साथ अभद्र व्यवहार करने का गंभीर आरोप लगाया था।

​सुखेंदु शेखर रॉय की भविष्यवाणी: टीएमसी के सबसे वरिष्ठ सांसदों में से एक सुखेंदु शेखर रॉय के एक बयान ने आग में घी का काम किया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि “तृणमूल कांग्रेस अब कुछ ही दिनों की मेहमान है, यह जल्द खत्म हो जाएगी और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पूरी विश्वसनीयता खो चुकी है।”

​नयना बंद्योपाध्याय का हस्ताक्षर विवाद: विधायक नयना बंद्योपाध्याय भी इन दिनों एक फर्जी हस्ताक्षर विवाद में फंसी हैं, जिसकी जांच राज्य की सीआईडी (CID) हैंडराइटिंग एक्सपर्ट्स की मदद से कर रही है।

​क्या ममता बनर्जी बचा पाएंगी अपना किला?

​राजनीतिक पंडितों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद नेताओं के इस्तीफे, एक-दूसरे पर सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप और अब 80 में से 60 विधायकों का मुख्यमंत्री के घर न पहुंचना कोई साधारण संगठनात्मक चूक नहीं है। यह ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ एक ‘साइलेंट रिवोल्ट’ (मौन विद्रोह) हो सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी अपने पुराने राजनीतिक कौशल से इस बिखराव को रोक पाएंगी, या फिर यह बंगाल की राजनीति में किसी नए समीकरण की शुरुआत है।

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