‘आप’ को डीरजिस्टर करने और केजरीवाल-सिसोदिया को चुनाव से रोकने की याचिका खारिज, दिल्ली हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
‘आप’ को डीरजिस्टर करने और केजरीवाल-सिसोदिया को चुनाव से रोकने की याचिका खारिज, दिल्ली हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) का पंजीकरण (Registration) रद्द करने और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया व दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले की गंभीरता और कानूनी आधार को परखते हुए साफ शब्दों में कहा कि यह याचिका पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित है और इसमें कोई मेरिट (ठोस कानूनी आधार) नहीं है।
यह याचिका उस विवाद से जुड़ी थी, जिसमें तीनों नेताओं पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के समक्ष चल रही आबकारी नीति (Excise Policy) मामले की अदालती कार्यवाही का कथित तौर पर बहिष्कार किया था। इसी आधार पर उनके खिलाफ चुनावी अयोग्यता और पूरी पार्टी पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी।
”क्या चुनाव आयोग के पास ऐसा कोई अधिकार है?”: हाई कोर्ट
सुनवाई की शुरुआत में ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों पर कड़ा रुख अपनाया। बेंच ने वकील से सीधा सवाल पूछा कि क्या देश के कानून में चुनाव आयोग (ECI) को किसी भी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने का कोई स्पष्ट प्रावधान मौजूद है?
इस तीखे सवाल पर याचिकाकर्ता के वकील को अदालत के समक्ष यह स्वीकार करना पड़ा कि ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ (Representation of the People Act) के तहत ऐसा कोई स्पष्ट या सीधा कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है, जिसके तहत किसी दल को इस तरह से डीरजिस्टर किया जा सके।
नेताओं के आचरण से पूरी पार्टी पर बैन क्यों?
अदालत ने याचिका के तर्कों को पूरी तरह अतार्किक बताते हुए पूछा कि अगर किसी पार्टी के कुछ गिने-चुने नेताओं के आचरण या व्यवहार पर कोई आपत्ति है, तो उसके आधार पर पूरे राजनीतिक दल का पंजीकरण कैसे रद्द किया जा सकता है? बेंच ने याचिकाकर्ता से पूछा कि वे उस ठोस कानून या धारा को बताएं जिस पर यह पूरी याचिका टिकी हुई है।
अवमानना और अयोग्यता के कानून अलग-अलग हैं
याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में यह भी कहा था कि नेताओं द्वारा अदालती कार्यवाही का कथित बहिष्कार करना और उसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करना ‘संविधान-विरोधी’ कदम है और यह सीधे तौर पर अदालत का अपमान (कंटेंप्ट) है।
इस पर हाई कोर्ट की बेंच ने स्थिति साफ करते हुए कहा:
अवमानना का अलग रास्ता: यदि किसी व्यक्ति या नेता ने अदालत की अवमानना की है, तो उसका समाधान ‘Contempt of Court Act’ (न्यायालय अवमानना अधिनियम) के तहत अलग से निकाला जाता है।
चुनाव लड़ने पर रोक नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति किसी मामले में अदालत की अवमानना का दोषी पाया भी जाता है, तब भी कानूनन ऐसा कोई नियम नहीं है जो उसे स्वतः ही भविष्य में चुनाव लड़ने से अयोग्य या प्रतिबंधित कर दे।
जब याचिकाकर्ता ने तीनों ‘आप’ नेताओं को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की मांग दोबारा उठाई, तो कोर्ट ने बेहद तल्ख लहजे में पूछा— “आखिर किस कानून या प्रावधान के तहत अदालत ऐसा कर सकती है?” बेंच ने दो टूक शब्दों में कहा कि वर्तमान परिस्थितियों और कानून के दायरे में इस तरह की घोषणा करने का न तो कोई कानूनी आधार बनता है और न ही कोई अवसर। अदालत की इन सख्त टिप्पणियों के बाद इस याचिका को बिना किसी राहत के खारिज कर दिया गया।
