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पहलगाम आतंकी हमले पर NIA की चार्जशीट में बड़ा खुलासा: लाहौर में बैठा ‘लंगड़ा’ था मास्टरमाइंड, पाकिस्तान की ‘फॉल्स फ्लैग’ साजिश बेनकाब

पहलगाम आतंकी हमले पर NIA की चार्जशीट में बड़ा खुलासा: लाहौर में बैठा ‘लंगड़ा’ था मास्टरमाइंड, पाकिस्तान की ‘फॉल्स फ्लैग’ साजिश बेनकाब

​नई दिल्ली/श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले को लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने कोर्ट में एक सनसनीखेज चार्जशीट दाखिल की है। इस चार्जशीट से यह पूरी तरह साफ हो गया है कि पहलगाम हमले की पूरी स्क्रिप्ट पाकिस्तान में बैठकर रची गई थी। जांच के मुताबिक, लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उसके मुखौटा संगठन टीआरएफ (TRF) का खूंखार आतंकी सैफुल्लाह उर्फ साजिद जट्ट उर्फ ‘लंगड़ा’ लाहौर से पूरे ऑपरेशन को रिमोट कंट्रोल के जरिए ऑपरेट कर रहा था।

​एनआईए ने अपनी चार्जशीट में साजिद जट्ट उर्फ ‘लंगड़ा’ को आरोपी नंबर-1 (मुख्य साजिशकर्ता) बनाया है।

​बेटे ने की पहचान, पुख्ता हुआ ‘लंगड़ा’ का सबूत

​जांच एजेंसी के हाथ इस बार साजिद जट्ट के खिलाफ बेहद पुख्ता और वैज्ञानिक सबूत लगे हैं:

​तस्वीर से पहचान: एनआईए को जांच के दौरान साजिद जट्ट की एक ताजा तस्वीर मिली, जिसकी पहचान कश्मीर में रह रहे उसके सगे बेटे से करवाई गई। बेटे ने पुष्टि की कि तस्वीर में दिख रहा शख्स ही उसका पिता है।

​अहम कड़ी: सुरक्षा एजेंसियां इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को घेरने के लिए एक बेहद अकाट्य सबूत मान रही हैं, जिससे उसकी लाहौर में मौजूदगी और आतंकी नेटवर्क की आधिकारिक पुष्टि होती है।

​कौन है साजिद जट्ट और कैसे बना ‘लंगड़ा’?

​साजिद जट्ट मूल रूप से पाकिस्तान के कसूर का रहने वाला है। उसका भारत विरोधी इतिहास काफी पुराना है:

​2005 में घुसपैठ: वह साल 2005 में सीमा पार से घुसपैठ कर कश्मीर आया था। उसने कुलगाम सहित दक्षिण कश्मीर को अपना गढ़ बनाया और स्थानीय युवाओं का ब्रेनवॉश कर ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGWs) का एक मजबूत स्लीपर सेल नेटवर्क तैयार किया।

​कश्मीर में शादी और फरार: 2005 से 2007 के बीच कश्मीर में रहने के दौरान उसने एक स्थानीय महिला से निकाह किया और बाद में वापस पाकिस्तान भाग गया।

​नकली टांग का इस्तेमाल: कश्मीर में एक मुठभेड़ के दौरान पैर में गोली लगने की वजह से उसकी एक टांग खराब हो गई थी। अब वह कृत्रिम (नकली) टांग के सहारे चलता है, इसी वजह से आतंकी गलियारों में उसे ‘लंगड़ा’ के नाम से जाना जाता है।

​TRF का जन्मदाता: साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद जब वैश्विक दबाव के कारण लश्कर बैकफुट पर आया, तो उसने अपनी रणनीति बदली। लश्कर ने ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) नाम का एक नया ऑनलाइन और जमीनी संगठन खड़ा किया, जिसे बनाने और उसका सोशल मीडिया नेटवर्क तैयार करने में साजिद जट्ट की मुख्य भूमिका थी।

​हमले की इनसाइड स्टोरी: पाकिस्तान से मिल रहा था ‘रियल-टाइम’ इनपुट

​चार्जशीट के अनुसार, पहलगाम के बैसरन घाटी में हुआ यह हमला कोई अचानक हुई घटना नहीं बल्कि एक सोची-समझी सैन्य रणनीति का हिस्सा था:

​15-16 अप्रैल (रेकी): साजिद जट्ट ने लाहौर से निर्देश देकर तीन पाकिस्तानी आतंकियों— फैजल जट्ट उर्फ सुलेमान, हबीब उर्फ छोटू और हमजा अफगानी को बैसरन घाटी भेजा। उन्होंने पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था और पर्यटकों की आवाजाही का खाका (मैप) तैयार किया।

​हमले का दिन (22 अप्रैल): हमले के दिन साजिद जट्ट लाहौर में बैठकर व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए आतंकियों को रियल-टाइम लोकेशन और आगे बढ़ने के निर्देश दे रहा था। आतंकियों के छिपने से लेकर भागने का रूट तक पाकिस्तान से ही तय किया गया था।

​लोकल नेटवर्क की गद्दारी: 26 लोगों की बच सकती थी जान

​एनआईए की जांच में कश्मीर के ही दो स्थानीय मददगारों (OGW)— परवेज और बशीर अहमद की बेहद खतरनाक भूमिका उजागर हुई है:

​आतंकियों को पनाह: 21 अप्रैल को जब तीनों पाकिस्तानी आतंकी जंगल के रास्ते पहलगाम पहुंचे, तो परवेज और बशीर ने उन्हें अपनी झोपड़ी में शरण दी। दोनों ने आतंकियों को खाना-पानी दिया और 5 घंटे तक छुपाए रखा। जाते समय उन्हें सफर के लिए 10 रोटियां और सब्जी भी बांधकर दी।

​पुलिस को नहीं दी सूचना: अगले दिन 22 अप्रैल को इन दोनों ने उन्हीं आतंकियों को बैसरन पार्क के पास हथियारों के साथ मंडराते देखा था। एनआईए का कहना है कि दोनों जानते थे कि ये वही आतंकी हैं, इसके बावजूद उन्होंने लालच या डरवश पुलिस को इसकी भनक नहीं लगने दी। अगर समय रहते सुरक्षा बलों को सूचना मिल जाती, तो इस हमले में मारे गए 26 मासूम लोगों की जान बचाई जा सकती थी।

​’फॉल्स फ्लैग’ साजिश का पर्दाफाश और तकनीकी सबूत

​अंतरराष्ट्रीय बिरादरी और ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (FATF) के डर से पाकिस्तान ने इस हमले को लेकर एक ‘फॉल्स फ्लैग’ (झूठा मुखौटा) ऑपरेशन रचने की कोशिश की थी:

​प्रोपेगैंडा चैनल्स: हमले के तुरंत बाद TRF ने अपने कुख्यात टेलीग्राम चैनल ‘Kashmir Fight’ पर इसकी जिम्मेदारी ली। लेकिन जैसे ही वैश्विक दबाव बढ़ा, उन्होंने यह अफवाह उड़ा दी कि उनका चैनल हैक हो गया था। एनआईए की साइबर विंग ने जब जांच की तो पता चला कि ‘Kashmir Fight’ चैनल पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा से और इसका दूसरा बैकअप चैनल रावलपिंडी से ऑपरेट हो रहा था।

​इसके अलावा, मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों के पास से जो स्मार्टफोन बरामद हुए हैं, उनकी फॉरेंसिक जांच में यह साबित हुआ है कि उनमें से एक फोन लाहौर और दूसरा कराची के बाजारों से खरीदा गया था। इन पुख्ता डिजिटल फुटप्रिंट्स ने पाकिस्तान के उस झूठ को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है जिसमें वह कश्मीर में होने वाले हमलों को ‘स्थानीय आक्रोश’ बताता रहा है।

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