अमेरिका ने रूसी तेल पर पाबंदियों से छूट 17 जून तक बढ़ाई; भारत का दोटूक जवाब- ‘छूट रहे या न रहे, रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेंगे’
वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी भारी उथल-पुथल के बीच अमेरिका और भारत के रुख ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को एक नया मोड़ दे दिया है। एक तरफ जहां अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को काबू में रखने के लिए रूसी तेल पर अपनी पाबंदियों में ढील की मियाद बढ़ा दी है, वहीं भारत ने दोटूक लहजे में अपनी संप्रभु ऊर्जा नीति को स्पष्ट कर दिया है।
अमेरिका ने रूसी तेल पर पाबंदियों से छूट 17 जून तक बढ़ाई; भारत का दोटूक जवाब- ‘छूट रहे या न रहे, रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेंगे’
नई दिल्ली/वाशिंगटन। वैश्विक कच्चे तेल के बाजार को स्थिर करने और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका ने रूसी तेल के समुद्री परिवहन पर लगी पाबंदियों से दी गई छूट को एक महीने के लिए और बढ़ा दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) द्वारा सोमवार रात जारी आदेश के मुताबिक, 17 अप्रैल या उससे पहले समुद्र में फंसे रूसी तेल पर प्रतिबंधों से मिली राहत अब 17 जून 2026 तक लागू रहेगी।
दिलचस्प बात यह है कि वाशिंगटन से इस समय-सीमा को बढ़ाने का आदेश उसी दिन आया, जिस दिन भारत ने वैश्विक मंच पर साफ कर दिया कि अमेरिकी छूट मिले या न मिले, वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा।
तेल बाजार को स्थिर करने की अमेरिकी मजबूरी
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर इस फैसले की पृष्ठभूमि साझा करते हुए कहा कि इस कदम से जरूरतमंद देशों को अतिरिक्त राहत मिलेगी और आवश्यकतानुसार विशेष लाइसेंस भी जारी किए जाएंगे। अमेरिकी प्रशासन की इस रणनीति के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं:
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का संकट: ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के चलते दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाला होर्मुज का रास्ता लगभग बंद है। खाड़ी देशों से होने वाली इस बड़ी किल्लत की भरपाई के लिए अमेरिका पर रूसी तेल को बाजार में आने देने का भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव था।
घरेलू राजनीति और मिडटर्म चुनाव: यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो अमेरिका के भीतर पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे। ट्रंप प्रशासन इस साल होने वाले अमेरिकी मिडटर्म (मध्यावधि) चुनावों से पहले किसी भी तरह की घरेलू नाराजगी से बचना चाहता है।
चीन पर लगाम: वित्त मंत्री बेसेंट के अनुसार, इस छूट से चीन द्वारा सस्ते रूसी तेल को बड़े पैमाने पर जमा (Stockpile) करने की क्षमता कम होगी और तेल की सप्लाई अन्य जरूरतमंद देशों की ओर मोड़ी जा सकेगी।
”व्यावसायिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं” — भारत का रुख
अमेरिका की इस घोषणा से ठीक पहले नई दिल्ली में पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत की नीति को पूरी सहजता और कड़ाई के साथ स्पष्ट किया। उन्होंने कहा:
”रूस पर अमेरिकी छूट के संबंध में मैं यह स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि हम पहले भी रूस से तेल खरीदते रहे हैं— छूट से पहले भी, छूट के दौरान भी और अब भी खरीदते रहेंगे। हमारे कच्चे तेल खरीदने के फैसले मुख्य रूप से व्यावसायिक दृष्टिकोण, बेहतर कीमतों और देश के लिए पर्याप्त आपूर्ति की उपलब्धता पर आधारित होते हैं।”
भारत ने पाबंदियों का ऐसे निकाला तोड़
भारत का हमेशा से यह रुख रहा है कि उसे रूसी तेल खरीदने के लिए किसी अमेरिकी छूट की बैसाखी की जरूरत नहीं है। भारत ने इस छूट का रणनीतिक लाभ उठाते हुए उन रूसी टैंकरों और कंपनियों (जैसे रोसनेफ्ट और लुकोइल) से भी तेल की खेप उठाई, जिन पर अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। अगर अमेरिका यह छूट आगे नहीं बढ़ाता, तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए ‘सेकेंडरी सैंक्शंस’ (द्वितीयक प्रतिबंधों) के डर से इन प्रतिबंधित जहाजों से तेल लेना मुश्किल हो जाता और आयात प्रभावित हो सकता था।
पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत के लिए संकटमोचक बना रूस
हाल के महीनों में भारत के कुल तेल आयात का करीब आधा हिस्सा (25 से 27 लाख बैरल प्रतिदिन) होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आता था, जो युद्ध के कारण ठप पड़ा है। ऐसे में इराक और कुवैत जैसे खाड़ी देशों से कम हुई आपूर्ति की भरपाई अकेले रूस ने की है।
भारत का रूसी तेल आयात चार्ट (एक नज़र में):
फरवरी 2026: भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से औसतन 10 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया (जो 2025 के सर्वोच्च स्तर 20 लाख बैरल का लगभग आधा था)।
मार्च 2026 (छूट के दौरान): अमेरिकी छूट और भू-राजनीतिक आवश्यकताओं के चलते मार्च में आयात दोगुना होकर 20 लाख बैरल प्रतिदिन के पार पहुंच गया। भारत के कुल तेल आयात में अकेले रूसी तेल की हिस्सेदारी 45 फीसदी रही।
अप्रैल और मई 2026: अप्रैल में मामूली गिरावट के बाद, अब मई में इसके एक बार फिर से 20 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर को छूने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है।
अमेरिका के भीतर ही इस फैसले की आलोचना
रूसी तेल पर बार-बार छूट बढ़ाने को लेकर अमेरिकी प्रशासन को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है। आलोचकों का तर्क है कि इस छूट से रूस को भारी वित्तीय लाभ हो रहा है, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में कर रहा है।
गौरतलब है कि अमेरिका ने रूस को तो दो बार यह रियायत दी, लेकिन ईरान के मामले में एक बार भी छूट की समय-सीमा नहीं बढ़ाई। वित्त मंत्री बेसेंट ने अमेरिकी कांग्रेस की सुनवाई में अपना बचाव करते हुए बताया था कि दुनिया के कम से कम 10 देशों ने उनसे गुहार लगाई थी कि यदि छूट न बढ़ाई गई, तो कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएगा, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था तबाह हो सकती है। इसी डर ने अमेरिका को अपने ही सख्त रुख से पीछे हटने पर मजबूर किया।
