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​वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत में ईंधन की कीमतें स्थिर: पिछले 4 वर्षों में 4 बार टैक्स कटौती, जानिए राज्यों में क्यों है अंतर

वैश्विक स्तर पर रूस-यूक्रेन युद्ध और हालिया होर्मुज संकट के चलते कच्चे तेल के बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिली है। इस वैश्विक मंदी और अनिश्चितता के बीच, जहां दुनिया भर के देशों में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं, वहीं भारत ने एक अलग और जन-अनुकूल नीति अपनाते हुए अपने नागरिकों को बड़ी राहत दी है।

​वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत में ईंधन की कीमतें स्थिर: पिछले 4 वर्षों में 4 बार टैक्स कटौती, जानिए राज्यों में क्यों है अंतर

​नई दिल्ली। पिछले चार वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अभूतपूर्व उतार-चढ़ाव देखा गया है। फरवरी 2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध और हाल ही में वर्ष 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में पैदा हुए भू-राजनीतिक संकट के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमतें कई बार 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं।

​जहां एक ओर दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों ने इस बढ़ी हुई कीमतों का पूरा बोझ सीधे अपने उपभोक्ताओं पर डाल दिया, वहीं भारत सरकार ने घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों को नियंत्रित और स्थिर रखने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाई।

​4 वर्षों में चार बार एक्साइज ड्यूटी में बड़ी कटौती

​भारत सरकार ने उपभोक्ताओं को सीधे राहत देने के लिए वर्ष 2021 से 2026 के बीच चार बार पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) में कटौती की:

​नवंबर 2021: पेट्रोल पर ₹5 और डीजल पर ₹10 प्रति लीटर की कटौती की गई।

​मई 2022: पेट्रोल ₹8 और डीजल ₹6 प्रति लीटर सस्ता हुआ।

​मार्च 2024 और अप्रैल 2025: इन दोनों अवधियों में भी कीमतों को घटाकर आम जनता को राहत दी गई।

​27 मार्च 2026 (सबसे बड़ी राहत): सरकार ने विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) में ₹10 प्रति लीटर की भारी कटौती की और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी को लगभग शून्य (Zero) कर दिया। इस अकेले फैसले से सरकार ने करीब ₹30,000 करोड़ का वित्तीय बोझ खुद उठाया।

​नोट: लगभग चार वर्षों तक कीमतों को काबू में रखने के बाद, हाल ही में 15 मई 2026 को दोनों ईंधनों की कीमतों में ₹0.91 प्रति लीटर की मामूली वृद्धि दर्ज की गई है।

​तेल बांड (Oil Bonds) बनाम मौजूदा वित्तीय नीति

​सरकार का स्पष्ट कहना है कि वर्तमान कीमतों की तुलना 2014 से पहले के दौर से करना तार्किक नहीं है। 2005 से 2010 के बीच तत्कालीन सरकार द्वारा तेल कंपनियों को नकद भुगतान करने के बजाय करीब ₹1.34 लाख करोड़ के तेल बांड जारी किए गए थे, जिसने भविष्य की अर्थव्यवस्था पर भारी कर्ज डाल दिया। वर्तमान सरकार को इस पुराने तेल बांड का भारी-भरकम भुगतान करना पड़ा है।

​इसके विपरीत, मौजूदा नीति के तहत सरकार ने कोई नया बांड जारी नहीं किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें बढ़ने पर सीधे टैक्स घटाकर राजस्व का नुकसान खुद वहन किया।

​सरकार और तेल कंपनियों ने उठाया भारी नुकसान

​अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बावजूद देश में कीमतें न बढ़ें, इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) और सरकार ने भारी आर्थिक दबाव झेला:

​होर्मुज संकट के दौरान राहत: संकट के समय पेट्रोल पर करीब ₹24 प्रति लीटर और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर तक का अंतर सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से खुद संभाला।

​कंपनियों का घाटा: 2021 से 2024 के बीच घरेलू तेल कंपनियों ने लगभग ₹24,500 करोड़ का शुद्ध नुकसान सहा।

​LPG पर सब्सिडी: आम उपभोक्ताओं को रसोई गैस की महंगाई से बचाने के लिए वित्तीय वर्ष 2024-25 में करीब ₹40,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ उठाया गया।

​वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत स्थिति (तुलनात्मक अध्ययन)

​फरवरी से मई 2026 के बीच, जब अंतरराष्ट्रीय संकट के कारण वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतें बेकाबू हो रही थीं, भारत में दाम लगभग स्थिर बने रहे।

देश         ईंधन की कीमतों में वृद्धि (फरवरी – मई 2026)

पाकिस्तान, अमेरिका, म्यांमार, मलेशिया  40% से 100% तक की भारी बढ़ोतरी

भारत      केवल 4% के आसपास सीमित वृद्धि

राज्यों में कीमतों में अंतर का गणित: वैट (VAT) का खेल

​अक्सर उपभोक्ताओं के मन में यह सवाल उठता है कि देश में एक्साइज ड्यूटी समान होने के बाद भी अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल-डीजल के दाम अलग क्यों हैं? इसका मुख्य कारण राज्य सरकारों द्वारा लगाया जाने वाला वैट (Value Added Tax) है।

​हाई वैट वाले राज्य (कीमतें ₹107/लीटर से ऊपर): आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में वैट की दरें 30% से भी अधिक हैं, जिसके कारण यहाँ ईंधन सबसे महंगा है।

​लो वैट वाले राज्य (कीमतें ₹97 या उससे नीचे): गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और असम जैसे राज्यों में राज्य सरकारों द्वारा टैक्स की दरें कम रखी गई हैं, जिससे यहाँ उपभोक्ताओं को कम कीमत चुकानी पड़ती है।

​निष्कर्ष

​वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बावजूद भारत सरकार की बहुस्तरीय रणनीति (टैक्स कटौती, निर्यात शुल्क लगाना और तेल कंपनियों द्वारा नुकसान उठाना) आम जनता के लिए ढाल साबित हुई है। हालांकि, देश के भीतर ईंधन के अंतिम दाम तय करने में केंद्र और राज्य दोनों की कर नीतियों का मिला-जुला प्रभाव पड़ता है।

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