उत्तराखंड

क्रूड ऑयल संकट का असर: उत्तराखंड में 60% महंगा हुआ तारकोल, सड़क निर्माण कार्य ठप; PWD ने वित्त विभाग को भेजा रेट रिवाइज करने का प्रस्ताव

क्रूड ऑयल संकट का असर: उत्तराखंड में 60% महंगा हुआ तारकोल, सड़क निर्माण कार्य ठप; PWD ने वित्त विभाग को भेजा रेट रिवाइज करने का प्रस्ताव

​देहरादून: पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और विवाद के कारण वैश्विक स्तर पर ईंधन की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। क्रूड ऑयल संकट का सीधा और बड़ा असर अब उत्तराखंड में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर दिखने लगा है। राज्य में सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले तारकोल (बिटुमेन) के दामों में पिछले कुछ महीनों में 60 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसके कारण कई विकास कार्य या तो ठप हो गए हैं या बेहद महंगे हो गए हैं।

​ठेकेदारों ने खड़े किए हाथ, रेट बढ़ाने की मांग

​तारकोल की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल के बाद ठेकेदारों ने पुराने टेंडर रेट पर काम करने से साफ इनकार कर दिया है। ठेकेदारों का कहना है कि मौजूदा बाजार दरों पर काम करना उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। इस संकट को देखते हुए लोक निर्माण विभाग (PWD) ने बढ़ी हुई लागत के आधार पर दरों को संशोधित (Rate Revise) करने का एक प्रस्ताव तैयार कर वित्त विभाग को भेजा है। विभाग को अब वित्त मंत्रालय की हरी झंडी का इंतजार है, ताकि सड़कों का निर्माण कार्य फिर से सुचारू किया जा सके।

​मार्च के बाद बिगड़े हालात

​लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पांडेय ने बताया कि राज्य में बिटुमेन की उपलब्धता को लेकर फिलहाल कोई बड़ी किल्लत नहीं है, लेकिन मार्च 2026 के बाद से इसकी कीमतों में जो उछाल आया है, उसने बजट के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। मार्च से पहले के रेट और अप्रैल-मई के रेट में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है।

​सचिव ने स्पष्ट किया कि:

​”भारत सरकार ने नेशनल हाईवे (NH) से संबंधित परियोजनाओं के लिए बढ़े हुए बिटुमेन रेट को अपनी मंजूरी दे दी है। कुछ अन्य राज्यों ने भी नई दरों को अपना लिया है। इसी को आधार बनाकर उत्तराखंड पीडब्ल्यूडी ने भी वित्त विभाग से अनुमति मांगी है, ताकि जिन ठेकेदारों के टेंडर मार्च से पहले हुए थे, उन्हें वर्तमान मार्केट रेट के अनुसार भुगतान की अनुमति मिल सके।”

​मानसून से पहले ‘गड्ढा मुक्त’ अभियान पर संकट

​पंकज कुमार पांडेय ने बताया कि सड़क निर्माण में बिटुमेन का इस्तेमाल केवल ऊपरी परत (ब्लैक टॉप) के लिए होता है, इसलिए पूरी परियोजना पर इसका असर सीमित है, फिर भी इसकी बढ़ी लागत प्रभावित जरूर कर रही है। वर्तमान में प्रदेश की करीब 4,000 किलोमीटर सड़कों पर काम चल रहा है।

​विभाग ने 15 मई तक राज्य की सभी सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन बेमौसम बारिश और बिटुमेन की बढ़ती कीमतों के चलते यह अभियान अपने तय समय से थोड़ा लेट चल रहा है। हालांकि, सड़कों को गड्ढा मुक्त करने के जो नए टेंडर हुए हैं, वे बढ़ी हुई दरों पर ही किए गए हैं, इसलिए उन पर काम जारी है।

​जल्द समाधान क्यों है जरूरी?

​मौसम विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों का मानना है कि मानसून के आगमन से पहले इस वित्तीय पेच को सुलझाना बेहद अनिवार्य है। यदि वित्त विभाग से रेट रिवीजन को जल्द मंजूरी नहीं मिली, तो बारिश शुरू होने से पहले सड़कों की मरम्मत और निर्माण कार्य पूरी तरह अधर में लटक सकते हैं, जिससे मानसून के दौरान आम जनता को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

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