चंपावत प्रकरण पर सियासी घमासान: कांग्रेस ने उठाए पुलिस की जांच पर सवाल, मानवाधिकार आयोग से न्यायिक जांच की मांग
चंपावत में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले ने अब राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। इस प्रकरण को लेकर कांग्रेस ने प्रदेश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यहाँ इस पूरे विवाद पर विस्तृत रिपोर्ट दी गई है:
चंपावत प्रकरण पर सियासी घमासान: कांग्रेस ने उठाए पुलिस की जांच पर सवाल, मानवाधिकार आयोग से न्यायिक जांच की मांग
देहरादून: उत्तराखंड के चंपावत जिले में सामने आए कथित सामूहिक दुष्कर्म मामले में कांग्रेस पार्टी ने सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ हमलावर रुख अपना लिया है। कांग्रेस का आरोप है कि सत्ताधारी दल के नेता का नाम सामने आने के बाद इस पूरे मामले में ‘लीपापोती’ की जा रही है।
मानवाधिकार आयोग पहुंची कांग्रेस
कांग्रेस की प्रदेश प्रवक्ता डॉ. प्रतिमा सिंह ने इस मामले में ‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग’ (NHRC) को पत्र लिखकर हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनके मुख्य तर्क निम्नलिखित हैं:
पुलिस की भूमिका पर संदेह: डॉ. सिंह ने सवाल उठाया कि जब मामला अभी कोर्ट में ट्रायल पर भी नहीं गया है, तो पुलिस प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना निर्णय कैसे सुना सकती है?
पीड़िता के पिता की स्थिति: उन्होंने कहा कि पीड़िता के 70 वर्षीय पिता दिव्यांग हैं और बिस्तर पर हैं। पुलिस का यह कहना कि यह सब एक ‘साजिश’ थी, गले नहीं उतरता। क्या एक बीमार वृद्ध और मेहनत करके पिता का इलाज कराने वाली बालिका किसी प्रलोभन में आकर ऐसी साजिश रच सकती है?
जांच में विरोधाभास: उन्होंने मांग की है कि एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज 164 के बयानों को सार्वजनिक किया जाए ताकि स्पष्ट हो सके कि पुलिस के दावों और हकीकत में क्या अंतर है।
सरकार पर ‘लीपापोती’ के आरोप
कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष धीरेंद्र प्रताप ने भी इस प्रकरण को लेकर सरकार को घेरा है। उन्होंने कहा कि अगर दुष्कर्म नहीं हुआ है तो यह खुशी की बात है, लेकिन जिस तरह से पुलिस आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है, उससे ‘घालमेल’ की बू आती है।
धीरेंद्र प्रताप ने इस मामले को लेकर राज्यपाल से मिलने का समय मांगा है और उनकी मुख्य मांगें ये हैं:
उच्च स्तरीय जांच: पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
अंकिता भंडारी केस का जिक्र: उन्होंने इस मामले के बहाने अंकिता भंडारी हत्याकांड को भी उठाते हुए प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगाया।
एनसीआरबी की रिपोर्ट: उन्होंने दावा किया कि एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, नौ हिमालयी राज्यों में उत्तराखंड महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में पहले पायदान पर पहुंच गया है, जो बेहद चिंताजनक है।
सत्ताधारी दल पर सीधा प्रहार
कांग्रेस ने सीधा आरोप लगाया है कि महिलाओं के खिलाफ हो रही आपराधिक घटनाओं में अक्सर सत्ताधारी दल के नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं। पार्टी का कहना है कि आरोपियों को बचाने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा है। कांग्रेस ने पीड़िता और उसके परिवार के लिए तत्काल सुरक्षा की मांग भी उठाई है।
निष्कर्ष: चंपावत का यह मामला अब केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उत्तराखंड में महिला सुरक्षा और राजनीतिक रसूख के बीच की एक बड़ी बहस बन गया है। अब सबकी नजरें मानवाधिकार आयोग के कदम और पुलिस द्वारा पेश किए जाने वाले ठोस सबूतों पर टिकी हैं।
