Thursday, September 10, 2026
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भारत-नेपाल सीमा पर ‘टैक्स युद्ध’: बालेन सरकार के नए नियम से व्यापार ठप, बॉर्डर पर फंसे हजारों ट्रक

भारत-नेपाल सीमा पर ‘टैक्स युद्ध’: बालेन सरकार के नए नियम से व्यापार ठप, बॉर्डर पर फंसे हजारों ट्रक

​काठमांडू/नई दिल्ली | अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने व्यापारिक रिश्तों में इन दिनों ‘कस्टम ड्यूटी’ और ‘MRP’ को लेकर कड़वाहट बढ़ गई है। नेपाल की नई बालेन सरकार द्वारा आयातित सामानों पर एमआरपी (MRP) लेबल अनिवार्य किए जाने के बाद से नेपाल-भारत सीमा पर तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। व्यापारियों के विरोध के चलते पिछले चार दिनों से आयात लगभग ठप है, जिससे नेपाल के बाजारों में महंगाई का संकट गहराने लगा है।

​क्या है नया नियम, जिस पर मचा है बवाल?

​नेपाल सरकार ने 28 अप्रैल से एक नया कानून लागू किया है। इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

​₹100 का फॉर्मूला: भारत से आने वाले हर उस सामान पर कस्टम ड्यूटी लगेगी जिसकी कीमत 100 नेपाली रुपए से अधिक है।

​MRP लेबल अनिवार्य: सीमा पार से आने वाले हर तैयार माल (Finished Goods) पर कस्टम क्लीयरेंस से पहले एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) का लेबल होना अनिवार्य है।

​तय सीमा: वाणिज्य विभाग ने 13 अप्रैल को नोटिस जारी कर व्यापारियों को महज 15 दिन का समय दिया था, जो अब खत्म हो चुका है।

​बॉर्डर पर लगा ट्रकों का अंबार, 1000 से ज्यादा कंटेनर फंसे

​नेपाल की न्यूज साइट द रिपब्लिका के अनुसार, सरकार के इस कड़े रुख के बाद व्यापारियों ने सामान का इम्पोर्ट रोक दिया है।

​प्रमुख चेकपोस्ट प्रभावित: बीरगंज, भैरहवा, विराटनगर, नेपालगंज और काकरभिट्टा जैसे बड़े कस्टम ऑफिसों ने बिना एमआरपी वाले सामान को एंट्री देने से मना कर दिया है।

​भारत की तरफ कतारें: भैरहवा कस्टम प्रमुख हरिहर पौडेल के मुताबिक, ज्यादातर ट्रक भारतीय सीमा के भीतर फंसे हुए हैं क्योंकि उनके पास जरूरी लेबलिंग नहीं है।

​छूट की श्रेणी: राहत की बात सिर्फ यह है कि पेट्रोलियम उत्पाद, औद्योगिक कच्चा माल और जल्दी खराब होने वाले सामान (फल-सब्जियों) को इस नियम से फिलहाल बाहर रखा गया है।

​व्यापारियों का तर्क: ‘व्यावहारिक नहीं है यह आदेश’

​नेपाली आयातकों और व्यापारियों का कहना है कि सरकार का यह फैसला जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। उनके विरोध के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

​पैकिंग की समस्या: एक शिपमेंट में हजारों छोटे-बड़े आइटम होते हैं। हर एक पर अलग से लेबल लगाना और बॉर्डर पर पैकेट खोलना सामान की सुरक्षा के लिए खतरा है।

​बढ़ती लागत: बॉर्डर पर दोबारा पैकिंग और लेबलिंग करने से लेबर कॉस्ट बढ़ेगी। साथ ही, देरी की वजह से ‘डेमरेज’ और ‘डिटेंशन’ चार्ज (जुर्माना) भी देना पड़ रहा है।

​लागत का बोझ: व्यापारियों का दावा है कि अगर यह नियम लागू रहा, तो सामान की अंतिम कीमत बढ़ जाएगी, जिसका सीधा बोझ नेपाल की आम जनता पर पड़ेगा।

​10 साल पुराना है विवाद

​दिलचस्प बात यह है कि नेपाल सरकार पिछले एक दशक से एमआरपी नियम लागू करने की कोशिश कर रही है। सबसे पहले 17 सितंबर 2012 को वाणिज्य मंत्रालय ने इसे अनिवार्य करने का नोटिस जारी किया था, लेकिन हर बार व्यापारियों के कड़े विरोध के कारण इसे ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। अब बालेन सरकार के इस सख्त रवैये ने एक बार फिर पुराने विवाद को हवा दे दी है।

​आगे क्या? यदि सरकार और व्यापारियों के बीच जल्द ही कोई बीच का रास्ता नहीं निकला, तो नेपाल में दैनिक उपभोग की वस्तुओं की भारी किल्लत हो सकती है। फिलहाल, बॉर्डर पर खड़े ट्रक और उनके ड्राइवर सरकार के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं।

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