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धार्मिक स्वतंत्रता बनाम संवैधानिक नैतिकता: सबरीमाला मामले में 9 जजों की पीठ के सामने तीखी बहस

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम संवैधानिक नैतिकता: सबरीमाला मामले में 9 जजों की पीठ के सामने तीखी बहस

​सबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बड़ी पीठ ने सुनवाई तेज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली यह पीठ विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या कर रही है, जो धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों से संबंधित हैं।

​सुनवाई की मुख्य बड़ी बातें:

​1. अंधविश्वास या धार्मिक प्रथा?

​सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने एक गंभीर सवाल उठाया कि यदि किसी प्रथा को ‘जादू-टोना’ जैसा अंधविश्वास माना जाए, तो क्या कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है?

​केंद्र का रुख: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने तर्क दिया कि अदालतें सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के आधार पर तो प्रतिबंध लगा सकती हैं, लेकिन वे यह तय नहीं कर सकतीं कि कौन सी धार्मिक प्रथा ‘अंधविश्वास’ है।

​अदालत की टिप्पणी: जस्टिस अमानुल्लाह ने असहमति जताते हुए कहा कि अदालत को यह तय करने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं, ताकि विधायिका उस आधार पर कानून बना सके।

​2. ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ पर सवाल

​CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि संविधान में कहीं भी ‘आवश्यक’ (Essential) शब्द का उल्लेख नहीं है।

​जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि किसी प्रथा के अनिवार्य होने का फैसला उस धर्म के दर्शन (Philosophy) के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि सती प्रथा या नरभक्षण जैसी चीजों को धर्म के नाम पर अनुमति नहीं दी जा सकती।

​3. जेंडर आधारित प्रवेश और भेदभाव

​केंद्र सरकार की ओर से पेश तुषार मेहता ने दलील दी कि किसी विशेष आयु वर्ग के किसी खास जेंडर (जैसे सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश) को रोकना हमेशा ‘भेदभाव’ की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि यह धार्मिक विश्वास का हिस्सा हो सकता है।

​4. राज्य का हस्तक्षेप कहाँ तक?

​SG मेहता ने तर्क दिया कि:

​संविधान में ‘धर्म’ शब्द की कोई सटीक परिभाषा नहीं है।

​राज्य का हस्तक्षेप केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित होना चाहिए, न कि मूल धर्म पर।

​उन्होंने उदाहरण दिया कि जो एक व्यक्ति के लिए अंधविश्वास है, वह नागालैंड या किसी अन्य समुदाय के लिए एक पवित्र धार्मिक प्रथा हो सकती है।

​निष्कर्ष और कोर्ट का कड़ा रुख

​अदालत ने स्पष्ट किया कि वह ‘अंतिम निर्णय विधायिका पर है’ वाली दलील को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर सकती। पीठ ने सती प्रथा और नरभक्षण जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोई प्रथा अमानवीय या संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ है, तो न्यायिक समीक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता।

​वर्तमान स्थिति: मामले की सुनवाई जारी है और कोर्ट यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता (Article 25) और किसी धार्मिक संस्था के अपने नियम बनाने के अधिकार (Article 26) के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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