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जयंती विशेष: ‘बाबूजी’ का वो अधूरा सपना और वो स्कैंडल जिसने प्रधानमंत्री पद की दौड़ से कर दिया बाहर

भारतीय राजनीति के इतिहास में बाबू जगजीवन राम एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने दशकों तक सत्ता के शिखर पर रहकर देश की सेवा की। लेकिन उनके शानदार करियर में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने उन्हें देश के सर्वोच्च पद यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी के बेहद करीब पहुंचकर भी दूर कर दिया। उनकी जयंती के अवसर पर आइए जानते हैं उस विवाद के बारे में जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी थी।

जयंती विशेष: ‘बाबूजी’ का वो अधूरा सपना और वो स्कैंडल जिसने प्रधानमंत्री पद की दौड़ से कर दिया बाहर

भारत के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और दलितों के मसीहा कहे जाने वाले बाबू जगजीवन राम की आज जयंती है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आपातकाल के बाद लोकतंत्र की बहाली तक, उनकी भूमिका अतुलनीय रही। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ‘स्कैंडल’ दर्ज है, जिसे उनकी राजनीतिक ढलान की बड़ी वजह माना जाता है।

जब प्रधानमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार थे ‘बाबूजी’

साल 1977 में जब आपातकाल के बाद चुनाव हुए, तो जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़कर ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई और जनता पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। जब जनता पार्टी की जीत हुई, तो प्रधानमंत्री पद के लिए तीन नाम रेस में थे: मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम।

एक समय ऐसा लग रहा था कि देश को अपना पहला दलित प्रधानमंत्री मिलने वाला है, लेकिन किस्मत और एक विवाद ने खेल बिगाड़ दिया।

वो स्कैंडल जिसने हिला दी नींव (Suresh Ram Controversy)

बाबू जगजीवन राम के प्रधानमंत्री न बन पाने के पीछे सबसे बड़ा कारण उनके बेटे सुरेश राम से जुड़ा एक स्कैंडल बना।

* क्या था मामला? 1978 में एक पत्रिका (सूर्या) ने सुरेश राम की कुछ आपत्तिजनक तस्वीरें प्रकाशित कर दी थीं। इस पत्रिका का संपादन मेनका गांधी कर रही थीं।

* राजनीतिक असर: इस स्कैंडल ने बाबू जगजीवन राम की छवि पर गहरा आघात किया। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया और खुद जनता पार्टी के अंदर उनके विरोधियों को उन्हें किनारे करने का मौका मिल गया।

* परिणाम: इस विवाद की वजह से उनकी नैतिकता पर सवाल उठाए गए और अंततः मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।

1979 का वो आखिरी मौका

1979 में जब मोरारजी सरकार गिर गई, तब जगजीवन राम के पास फिर से मौका था। लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें सरकार बनाने का न्योता देने के बजाय लोकसभा भंग कर दी। बाबूजी ने बाद में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था कि “एक अछूत होने के कारण मुझे प्रधानमंत्री बनने से रोका गया।”

एक बेमिसाल राजनीतिक सफर

विवादों को दरकिनार कर दें, तो बाबू जगजीवन राम का योगदान अविस्मरणीय है:

* रक्षा मंत्री के रूप में: 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय वह देश के रक्षा मंत्री थे, जिसमें भारत ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

* कृषि मंत्री के रूप में: भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने (हरित क्रांति) में उनकी भूमिका अहम थी।

* सबसे लंबा कार्यकाल: वह लगातार 32 वर्षों तक केंद्रीय कैबिनेट का हिस्सा रहे, जो एक विश्व रिकॉर्ड जैसा है।

“बाबूजी का सपना सिर्फ प्रधानमंत्री बनना नहीं, बल्कि अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सत्ता के केंद्र में लाना था।”

आज उनकी जयंती पर देश उन्हें एक कुशल प्रशासक और सामाजिक न्याय के योद्धा के रूप में याद करता है। भले ही वह प्रधानमंत्री नहीं बन सके, लेकिन भारतीय लोकतंत्र के निर्माण में उनका कद किसी भी पद से कहीं ऊंचा रहेगा।

 

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