राजनीति

DMK का मास्टरस्ट्रोक: ‘द्रविड़ियन मॉडल’ बनाम ‘दिल्ली का रिमोट’

तमिलनाडु की राजनीति में 2026 के विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके (DMK) ने अपनी चुनावी बिसात बिछाना शुरू कर दी है। इस बार डीएमके की रणनीति केवल अपनी उपलब्धियां गिनाना नहीं, बल्कि मुख्य विपक्षी दल एआईएडीएमके (AIADMK) को जनता की नजरों में भाजपा का ‘मोहरा’ या ‘कठपुतली’ साबित करना है।

DMK का मास्टरस्ट्रोक: ‘द्रविड़ियन मॉडल’ बनाम ‘दिल्ली का रिमोट’

चेन्नई: जैसे-जैसे 2026 के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, तमिलनाडु में जुबानी जंग तेज हो गई है। डीएमके ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत एआईएडीएमके के नेता एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें भाजपा के एजेंडे का हिस्सा करार दिया है।

1. ‘मोहरा’ साबित करने की रणनीति के 3 मुख्य आधार

डीएमके का अभियान मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर केंद्रित है ताकि मतदाताओं के मन में एआईएडीएमके की छवि को कमजोर किया जा सके:

* डर और ब्लैकमेल का नैरेटिव: उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन और मुख्यमंत्री स्टालिन अपनी रैलियों में बार-बार यह कह रहे हैं कि एआईएडीएमके का भाजपा के साथ गठबंधन किसी विचारधारा की वजह से नहीं, बल्कि ‘डर और ब्लैकमेल’ के कारण है। वे जनता को यह संदेश दे रहे हैं कि एआईएडीएमके नेता केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई से बचने के लिए भाजपा के सामने नतमस्तक हैं।

* अल्पसंख्यक और तमिल अस्मिता का मुद्दा: स्टालिन ने हाल ही में तिरुचि की रैली में सीएए (CAA) और श्रीलंका के तमिलों के मुद्दे पर एआईएडीएमके को घेरा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ईपीएस (EPS) खुद को स्वतंत्र नेता मानते हैं, तो वे सीएए जैसे मुद्दों पर भाजपा के खिलाफ कड़ा रुख क्यों नहीं अपनाते?

* सीटों का गणित और ‘लोटस’ सिंबल: डीएमके इस बात को मुद्दा बना रही है कि गठबंधन में कई छोटे दल एआईएडीएमके के बजाय भाजपा के ‘कमल’ निशान पर चुनाव लड़ने की चर्चा कर रहे हैं। इसे डीएमके ने “दूल्हे की शेरवानी उधार की” बताते हुए कटाक्ष किया है कि गठबंधन की कमान असल में दिल्ली (भाजपा) के हाथ में है।

2. ‘दक्षिण प्रदेश’ का डर और क्षेत्रीय भावनाएं

डीएमके के रणनीतिकारों ने एक नया मुद्दा उछाला है— ‘दक्षिण प्रदेश’। स्टालिन का दावा है कि यदि भाजपा-एआईएडीएमके गठबंधन सत्ता में आता है, तो वे तमिलनाडु का नाम बदलकर ‘दक्षिण प्रदेश’ कर सकते हैं और इसे उत्तर प्रदेश या मणिपुर जैसी स्थितियों की ओर धकेल सकते हैं। यह सीधे तौर पर तमिल क्षेत्रीय गौरव को झकझोरने की कोशिश है।

3. एआईएडीएमके की दुविधा

एक तरफ जयललिता की विरासत को बचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ भाजपा के साथ गठबंधन की मजबूरी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईपीएस के लिए यह साबित करना मुश्किल हो रहा है कि वे गठबंधन में ‘बड़े भाई’ की भूमिका में हैं, क्योंकि भाजपा की तमिलनाडु इकाई पहले के मुकाबले अधिक आक्रामक और मुखर है।

4. विजय (TVK) की एंट्री से बदला समीकरण

अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी ‘तमिझगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के आने से मुकाबला अब त्रिकोणीय हो गया है। डीएमके चाहती है कि सत्ता विरोधी वोट एआईएडीएमके और विजय के बीच बंट जाएं, जबकि एआईएडीएमके को भाजपा के साथ जोड़कर वे इसे केवल ‘द्रविड़ विचारधारा बनाम हिंदू राष्ट्रवाद’ की लड़ाई बनाना चाहते हैं।

निष्कर्ष: डीएमके का ‘इनसाइड गेम’ बहुत स्पष्ट है— एआईएडीएमके को भाजपा का पिछलग्गू बताकर उनके पारंपरिक तमिल और अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाना। यदि डीएमके जनता को यह समझाने में सफल रही कि पलानीस्वामी का रिमोट कंट्रोल दिल्ली में है, तो 2026 की राह उनके लिए काफी आसान हो सकती है।

 

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