54 साल बाद फिर चांद की ओर NASA: आखिर चंद्रमा पर ऐसा क्या मिला, जिसके लिए मून मिशन बना मजबूरी?
करीब 5 दशकों के लंबे अंतराल के बाद नासा (NASA) अपने आर्टेमिस मिशन (Artemis Mission) के जरिए एक बार फिर इंसानों को चांद पर भेजने की तैयारी कर रहा है। 1972 के ‘अपोलो 17’ मिशन के बाद अब जाकर चांद को लेकर दुनिया की दिलचस्पी फिर से चरम पर है।
यहाँ जानिए आखिर 54 साल बाद नासा को इसकी जरूरत क्यों पड़ी और चांद पर ऐसा क्या छिपा है:
54 साल बाद फिर चांद की ओर NASA: आखिर चंद्रमा पर ऐसा क्या मिला, जिसके लिए मून मिशन बना मजबूरी?
वॉशिंगटन: आधी सदी से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद नासा का चांद पर वापस जाना सिर्फ एक ‘विजिट’ नहीं बल्कि भविष्य के अंतरिक्ष विज्ञान की नींव है। 1969 में नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर कदम रख कर इतिहास रचा था, लेकिन तब मकसद सिर्फ ‘पहुंचना’ था, जबकि अब मकसद वहां ‘बसना’ और आगे बढ़ना है।
1. पानी की खोज: ‘चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव’ (The South Pole)
1970 के दशक में वैज्ञानिक मानते थे कि चांद पूरी तरह सूखा है। लेकिन हाल के वर्षों में (भारत के चंद्रयान सहित अन्य मिशनों से) यह पुष्टि हुई है कि चांद के दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ के रूप में भारी मात्रा में पानी मौजूद है।
* उपयोग: इस बर्फ से पीने का पानी, ऑक्सीजन और सबसे महत्वपूर्ण—रॉकेट ईंधन (हाइड्रोजन) बनाया जा सकता है। यह चांद को एक ‘कॉस्मिक गैस स्टेशन’ में बदल देगा।
2. मंगल ग्रह का दरवाजा (Gateway to Mars)
नासा का असली लक्ष्य केवल चांद नहीं, बल्कि मंगल (Mars) है। पृथ्वी से सीधा मंगल पर जाना बेहद महंगा और कठिन है।
* चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से 6 गुना कम है।
* वहां से स्पेसक्राफ्ट लॉन्च करना बहुत आसान और सस्ता होगा। नासा वहां एक ‘लूनर गेटवे’ (अंतरिक्ष स्टेशन) बनाना चाहता है जो मंगल की यात्रा के लिए बेस कैंप का काम करेगा।
3. बेशकीमती संसाधन: हीलियम-3 (Helium-3)
चांद की सतह पर हीलियम-3 का विशाल भंडार है, जो पृथ्वी पर बहुत दुर्लभ है।
* महत्व: हीलियम-3 भविष्य में न्यूक्लियर फ्यूजन (Nuclear Fusion) के जरिए स्वच्छ और असीमित ऊर्जा (Clean Energy) प्रदान कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि चांद पर मौजूद हीलियम-3 आने वाले सैकड़ों सालों तक पृथ्वी की ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता है।
4. स्पेस इकोनॉमी और चीन से मुकाबला
आज के दौर में अंतरिक्ष सिर्फ विज्ञान नहीं, बल्कि भू-राजनीति (Geopolitics) का हिस्सा है।
* चीन तेजी से अपनी लूनर बेस योजना पर काम कर रहा है।
* नासा चाहता है कि चांद पर अंतरराष्ट्रीय नियम और अमेरिकी मौजूदगी बनी रहे, ताकि वहां के संसाधनों पर किसी एक देश का एकाधिकार न हो।
अपोलो और आर्टेमिस में क्या अंतर है?
| विशेषता | अपोलो मिशन (1960-70s) | आर्टेमिस मिशन (वर्तमान) |
| लक्ष्य | सिर्फ झंडा गाड़ना और नमूने लाना | स्थायी बेस बनाना और रहना |
| यात्री | केवल पुरुष | पहली महिला और पहले अश्वेत व्यक्ति भी शामिल |
| तकनीक | सीमित कंप्यूटर क्षमता | AI, रोबोटिक्स और आधुनिक 3D प्रिंटिंग |
निष्कर्ष: नासा के लिए चांद अब सिर्फ एक उपग्रह नहीं, बल्कि एक आठवां महाद्वीप है जिसे एक्सप्लोर करना मानवता के अगले चरण (Multi-planetary species) के लिए अनिवार्य हो गया है।
