राजनीति

खेला होबे 2.0: क्या ममता बनर्जी फिर दोहरा पाएंगी 2021 वाला इतिहास?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर ‘खेला’ शुरू हो चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए ‘खेला होबे 2.0’ का बिगुल फूंक दिया है। 2021 के चुनावों में इस नारे ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की जीत में जो जान फूंकी थी, क्या वही जादू इस बार भी देखने को मिलेगा? पेश है इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट:

खेला होबे 2.0: क्या ममता बनर्जी फिर दोहरा पाएंगी 2021 वाला इतिहास?

पश्चिम बंगाल में चुनावी बिगुल बज चुका है। सूबे में दो चरणों (23 अप्रैल और 29 अप्रैल) में मतदान होना है और नतीजे 4 मई को आएंगे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी चुनावी रणनीति को धार देते हुए ‘खेला होबे 2.0’ कैंपेन लॉन्च किया है। हालांकि, इस बार की राजनीतिक बिसात 2021 से काफी अलग नजर आ रही है।

1. डिजिटल आर्मी बनाम सांस्कृतिक दांव

TMC ने इस बार तकनीक का सहारा लिया है। ‘दीदीर दूत’ ऐप के जरिए करीब 18 लाख लोगों तक पहुँचने का लक्ष्य है। पार्टी का दावा है कि उनके पास 1.5 लाख व्हाट्सएप ग्रुप्स और रोज 10,000 रील्स बनाने वाली एक विशाल डिजिटल सेना है। इसके जवाब में भाजपा ने बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और ‘स्थानीय मुद्दों’ को केंद्र में रखकर जवाबी हमला तेज कर दिया है।

2. वादों का पिटारा: लक्ष्मी भंडार और युवा शक्ति

TMC ने अपने मेनिफेस्टो में लोकलुभावन घोषणाओं की झड़ी लगा दी है:

* लक्ष्मी भंडार: महिलाओं को मिलने वाली सहायता राशि में 500 रुपये की और बढ़ोतरी।

* रोजगार: ‘बांग्ला युवा शक्ति’ योजना के तहत बेरोजगार युवाओं को आर्थिक मदद।

* कृषि और आवास: 30,000 करोड़ का कृषि फंड और हर गरीब को पक्का घर देने का वादा।

3. रणनीतिक बदलाव: प्रशांत किशोर की कमी?

2021 में ममता के साथ रणनीतिकार प्रशांत किशोर (I-PAC) थे। इस बार भी I-PAC पर्दे के पीछे से काम कर रही है, लेकिन प्रशांत किशोर सीधे तौर पर मैदान में नहीं हैं। वहीं, भाजपा ने शुभेंदु अधिकारी को ममता के खिलाफ उनके गढ़ भवानीपुर में उतारकर इस मुकाबले को बेहद दिलचस्प और व्यक्तिगत बना दिया है।

4. वोट बैंक का नया समीकरण

इस बार ममता बनर्जी केवल हिंदू-मुस्लिम वोटों तक सीमित नहीं हैं। हाल ही में उन्होंने उत्तर बंगाल के चर्चों का दौरा कर ईसाई समुदाय को साधने की कोशिश की है। उत्तर बंगाल, जो भाजपा का मजबूत किला माना जाता है, वहां सेंध लगाना ही ‘खेला होबे 2.0’ की असली परीक्षा होगी।

निष्कर्ष: ‘खेला होबे’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के जुझारू तेवर का प्रतीक है। जहां विपक्ष भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था के मुद्दे पर घेर रहा है, वहीं ममता अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं और ‘बंगाली अस्मिता’ के सहारे चौथी बार सत्ता की कुर्सी तक पहुँचने की कोशिश में हैं। क्या जनता फिर से ‘खेला’ स्वीकार करेगी? इसका जवाब 4 मई को ईवीएम से निकलेगा।

 

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