नक्सलवाद का अंत: 10 साल, 10 हजार सरेंडर और ‘लाल गलियारे’ की सिमटती सीमाएं
नक्सलवाद का अंत: 10 साल, 10 हजार सरेंडर और ‘लाल गलियारे’ की सिमटती सीमाएं
भारत सरकार ने पिछले एक दशक में देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती—नक्सलवाद—पर नकेल कसने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में 10,000 से अधिक माओवादियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की है। गृह मंत्रालय ने 31 मार्च 2026 तक देश को पूरी तरह नक्सल मुक्त करने का जो लक्ष्य रखा था, भारत उसके बेहद करीब पहुंच गया है।
नक्सलवाद पर नकेल: 10 साल के बड़े आंकड़े
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2026 के बीच नक्सली हिंसा और उनके प्रभाव में भारी गिरावट आई है:
* प्रभावित जिले: 2014 में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 थी, जो 2026 की शुरुआत तक घटकर केवल 11 रह गई है। इनमें से भी ‘अति प्रभावित’ जिले अब मात्र 3 बचे हैं।
* हिंसा में कमी: नक्सली घटनाओं में 53% और सुरक्षा बलों व नागरिकों की मृत्यु दर में 70% से 90% तक की कमी दर्ज की गई है।
* सम्पत्ति ज़ब्त: एनआईए (NIA) और ईडी (ED) ने मिलकर नक्सलियों के फंडिंग नेटवर्क पर प्रहार करते हुए लगभग ₹92 करोड़ की संपत्ति कुर्क की है।
वे 5 अहम फैक्टर जिनसे टूटा नक्सलियों का मनोबल
सरकार की बहुआयामी रणनीति (Unified Command Strategy) ने नक्सलियों को बैकफुट पर धकेल दिया। इसके पीछे ये मुख्य कारण रहे:
1. ऑपरेशन ‘समाधान’ (SAMADHAN):
2017 में लॉन्च इस रणनीति ने सुरक्षा बलों को ‘रक्षात्मक’ के बजाय ‘आक्रामक’ बनाया। इसका मतलब है:
* S- Smart Leadership (कुशल नेतृत्व)
* A- Aggressive Strategy (आक्रामक रणनीति)
* M- Motivation and Training (प्रशिक्षण)
* A- Actionable Intelligence (सटीक खुफिया जानकारी)
* D- Dashboard-based KPI (प्रदर्शन की निगरानी)
* H- Harnessing Technology (ड्रोन और तकनीक का उपयोग)
* A- Action Plan for each Theatre (हर क्षेत्र के लिए अलग योजना)
* N- No access to Financing (फंडिंग रोकना)
2. सुरक्षा घेरा और नए कैंप:
पिछले 6 वर्षों में अबूझमाड़ जैसे नक्सलियों के गढ़ों में 361 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए। 586 से ज्यादा फोर्टिफाइड (किलाबंद) पुलिस स्टेशन बनाए गए, जिससे नक्सलियों का ‘सेफ हेवन’ खत्म हो गया।
3. सड़क और कनेक्टिविटी का जाल:
नक्सल प्रभावित इलाकों में 12,000 किमी से ज्यादा लंबी सड़कों का निर्माण किया गया। साथ ही 8,500 से अधिक मोबाइल टावर लगाए गए। सड़कों ने सुरक्षा बलों की पहुंच आसान की और मोबाइल टावरों ने नक्सलियों की सूचना तंत्र को कमजोर कर दिया।
4. पुनर्वास नीति (Surrender Policy):
सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए आकर्षक योजनाएं पेश कीं। सरेंडर करने वालों को तत्काल वित्तीय सहायता, व्यावसायिक प्रशिक्षण और आवास की सुविधा दी गई। 2025 में अकेले 2,300 माओवादियों ने इस नीति का लाभ उठाकर हथियार डाले।
5. शिक्षा और विकास की ‘रोशनी’:
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 130 से अधिक एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS) और कई ITI केंद्र खोले गए। ‘रोशनी’ जैसी योजनाओं के जरिए आदिवासी युवाओं को कौशल विकास से जोड़कर उन्हें नक्सली भर्ती से दूर रखा गया।
निष्कर्ष: गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा था कि “नक्सलवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है।” सुरक्षा, विकास और विश्वास की इस त्रिकोणीय रणनीति ने ‘रेड कॉरिडोर’ को इतिहास के पन्नों तक समेट दिया है।
