दिल्ली आबकारी नीति पर PAC का बड़ा खुलासा: ₹2000 करोड़ के राजस्व का नुकसान, नियमों की उड़ी धज्जियां
दिल्ली की राजनीति में एक बार फिर ‘शराब घोटाले’ को लेकर तूफान खड़ा हो गया है। लोक लेखा समिति (PAC) की ताजा रिपोर्ट ने तत्कालीन केजरीवाल सरकार और विशेष रूप से पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
दिल्ली आबकारी नीति पर PAC का बड़ा खुलासा: ₹2000 करोड़ के राजस्व का नुकसान, नियमों की उड़ी धज्जियां
नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा की लोक लेखा समिति (PAC) ने सोमवार (23 मार्च 2026) को अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट सदन में पेश की। इस रिपोर्ट में 2021 की विवादित आबकारी नीति और उससे पहले की नीतियों (2017-2021) की विस्तृत समीक्षा की गई है। रिपोर्ट के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं, जिनमें सरकार को भारी वित्तीय नुकसान और प्रशासनिक अनियमितताओं का दोषी ठहराया गया है।
रिपोर्ट के 5 सबसे बड़े खुलासे
1. ₹2000 करोड़ से अधिक की चपत
PAC की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के कार्यकाल के दौरान लिए गए गलत फैसलों के कारण दिल्ली के सरकारी खजाने को ₹2000 करोड़ से अधिक का घाटा हुआ। CAG (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट ने भी इस भारी राजस्व हानि की पुष्टि की है।
2. ‘मनमानी’ फैसले और प्रक्रियाओं का उल्लंघन
रिपोर्ट के अनुसार, नीति निर्माण के दौरान कई महत्वपूर्ण निर्णय बिना सक्षम प्राधिकारी (LG या कैबिनेट) की मंजूरी के लिए गए। विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को दरकिनार किया गया और लाइसेंस शुल्क जमा न करने वाले शराब कारोबारियों पर नरमी बरती गई। साथ ही, एयरपोर्ट जोन में जमा राशि (EMD) को नियमों के खिलाफ जाकर वापस कर दिया गया।
3. वर्टिकल इंटीग्रेशन और कंपनियों की मिलीभगत
जांच में पाया गया कि थोक और खुदरा शराब विक्रेताओं के बीच ‘सांठगांठ’ थी:
* Indospirit और KhaoGali Restaurants के बीच शेयरहोल्डिंग और डायरेक्टर्स के स्तर पर गहरे संबंध पाए गए।
* KhaoGali ने अपने स्टॉक का 45.26% हिस्सा इंडोस्पिरिट से खरीदा, जो नियमों के विरुद्ध ‘वर्टिकल इंटीग्रेशन’ की ओर इशारा करता है।
4. टेंडर प्रक्रिया में धांधली
रिपोर्ट में टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। कुल 22 शिकायतों में से 9 बोलीदाता अयोग्य पाए गए थे, फिर भी बिना उचित जांच के उन्हें 17 खुदरा जोन आवंटित कर दिए गए। पारदर्शिता की कमी के कारण इस नीति को लागू होने के एक साल के भीतर ही (31 अगस्त 2022) वापस लेना पड़ा था।
5. पुरानी नीति (2017-21) में भी झोल
PAC ने केवल नई ही नहीं, बल्कि 2017 से 2021 के बीच की पुरानी नीति में भी गंभीर खामियां पाई हैं:
* नियमों का उल्लंघन कर लाइसेंस जारी करना।
* शराब की गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) में ढिलाई।
* Excise Intelligence Bureau (EIB) और प्रवर्तन शाखा की विफलता।
आगे क्या होगा?
यह मामला फिलहाल सीबीआई (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के अधीन है और अदालत में लंबित है। PAC ने अपनी सिफारिशों और रिपोर्ट के आधार पर अंतिम कार्रवाई का फैसला सदन (विधानसभा) के विवेक पर छोड़ दिया है।
PAC का निष्कर्ष: “नीति निर्माण और क्रियान्वयन में नियमों की जानबूझकर अनदेखी की गई, जिससे न केवल राजस्व का नुकसान हुआ बल्कि शराब माफियाओं को अनुचित लाभ पहुँचाया गया।”
