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भारत ने खोजा नया रास्ता… अब होर्मुज पर निर्भर नहीं! यहां से आ रहा तेल का भंडार – ऊर्जा सुरक्षा में बड़ा मास्टरस्ट्रोक

भारत ने खोजा नया रास्ता… अब होर्मुज पर निर्भर नहीं! यहां से आ रहा तेल का भंडार – ऊर्जा सुरक्षा में बड़ा मास्टरस्ट्रोक

मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में तनाव और जहाजों की आवाजाही पर रोक के कारण वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव किया है – अब 70% से ज्यादा कच्चा तेल (कुछ रिपोर्ट्स में 75% तक) होर्मुज के अलावा वैकल्पिक रास्तों से आ रहा है। यह पहले 55% था, जो अब 70-75% हो गया है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और सरकारी सूत्रों ने कन्फर्म किया कि तेल आयात “फुल फ्लो” में है, कोई कमी नहीं।

कहां से आ रहा तेल का भंडार? मुख्य स्रोत और रास्ते:

रूस: सबसे बड़ा सप्लायर – डिस्काउंटेड क्रूड की बड़ी खेपें आ रही हैं। अमेरिका ने 30 दिनों की स्पेशल छूट दी है, जिससे रूसी तेल तेजी से भारत पहुंच रहा है।

पश्चिम अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला आदि): नया फोकस – जहाजों को अफ्रीका के रास्ते हिंद महासागर से सीधा भारत लाया जा रहा है।

अमेरिका (US): शेल ऑयल और अन्य – लंबा लेकिन सुरक्षित रूट (अटलांटिक से केप ऑफ गुड होप या अन्य)।

लैटिन अमेरिका (ब्राजील, मैक्सिको आदि): बढ़ती खरीद।

सऊदी अरब और UAE के वैकल्पिक पाइपलाइन रूट:

सऊदी का ईस्ट-वेस्ट पेट्रोलाइन (Petroline) – तेल रेड सी के यानबू पोर्ट तक जाता है, फिर जहाज से भारत।

UAE का हबशान-फुजैराह पाइपलाइन (Habshan-Fujairah) – सीधे गल्फ ऑफ ओमान तक, होर्मुज बायपास।

क्यों सफल रहा यह प्लान?

पिछले 10 सालों में भारत ने तेल आयात करने वाले देशों की संख्या 27 से बढ़ाकर 40 कर दी।

कुल कच्चा तेल आयात का 85-88% आयात पर निर्भर, लेकिन अब होर्मुज पर निर्भरता घटकर 30% से कम रह गई (पहले 40-45%)।

नौसेना की ऑपरेशन संकल्प के तहत जहाजों को प्रोटेक्शन – कई टैंकर सुरक्षित पहुंचे।

रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) में 74 दिनों का स्टॉक – रिफाइनरियां 100%+ क्षमता पर चल रही हैं।

असर और राहत:

पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहने की उम्मीद, कोई बड़ा संकट नहीं।

LPG (रसोई गैस) पर भी फोकस – कुछ जहाज होर्मुज से गुजर रहे हैं, लेकिन वैकल्पिक स्रोत (US आदि) से सप्लाई बढ़ाई जा रही है।

ट्रेड एक्सपर्ट्स कहते हैं: लंबे रूट से फ्रेट कॉस्ट बढ़ सकती है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा पहले।

यह भारत की “ऊर्जा सुरक्षा” में बड़ा कदम है – अब कोई एक रूट या देश पर पूरी निर्भरता नहीं।

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