‘दुनिया विनाश की कगार पर, सिर्फ भारत ही रोक सकता है युद्ध’: RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान
आरएसएस (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने आज नागपुर में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के विदर्भ प्रांत कार्यालय के शिलान्यास समारोह को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने वैश्विक अशांति और युद्धों के बीच भारत की भूमिका को लेकर बड़ा बयान दिया है।
‘दुनिया विनाश की कगार पर, सिर्फ भारत ही रोक सकता है युद्ध’: RSS प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने वैश्विक संघर्षों पर चिंता जताते हुए कहा कि आज पूरी दुनिया विनाश की ओर बढ़ रही है और भारत ही वह शक्ति है जो इन युद्धों को समाप्त कर शांति स्थापित कर सकता है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि दुनिया के बड़े चिंतक अब समाधान के लिए भारत की ओर देख रहे हैं।
संबोधन की 5 प्रमुख बातें:
* युद्ध की वजह ‘स्वार्थ’ और ‘वर्चस्व’: भागवत ने कहा कि वर्तमान में हो रहे युद्धों के पीछे केवल स्वार्थ और वर्चस्व की कलह है। “मेरे पास नहीं है तो मैं वहां से लाऊंगा, इसी सोच के कारण संघर्ष हो रहे हैं।”
* जंगल का कानून बनाम मनुष्यता: उन्होंने एक तीखा अंतर स्पष्ट करते हुए कहा, “भारत के लोग मनुष्यता का कानून मानकर चलते हैं, जबकि बाकी दुनिया आज भी जंगल का कानून (Law of the Jungle) मानती है।”
* भारत की शक्ति और उदाहरण: आरएसएस प्रमुख के अनुसार, दुनिया भारत की आवाज तभी सुनेगी जब हमारे पास शक्ति होगी। जब भारत अपना उदाहरण पेश करेगा, तभी पूरी दुनिया उसका अनुकरण करेगी और शांति स्थापित होगी।
* 2000 वर्षों के प्रयोग विफल: उन्होंने कहा कि पिछले 2000 सालों में दुनिया ने कट्टरपंथ और ऊंच-नीच के कई प्रयोग किए, लेकिन न कलह बंद हुई और न ही दूसरों को बदलने का प्रयास। इन प्रयोगों से फायदे से ज्यादा नुकसान हुआ है।
* सनातन धर्म और ईश्वरीय इच्छा: भागवत ने कहा कि सनातन धर्म का उत्थान ईश्वरीय इच्छा है। विश्व अभी लड़खड़ा रहा है और इसे संभालने के लिए भारत को तैयार होना पड़ेगा।
“धर्म आचरण में दिखना चाहिए”
विहिप के कार्यक्रम में भागवत ने स्पष्ट किया कि धर्म केवल पुस्तकों या प्रवचनों में नहीं होता, बल्कि वह समाज के आचरण में प्रकट होना चाहिए। उन्होंने आह्वान किया कि भारत में धर्म के पीछे समाज की शक्ति का खड़ा होना अनिवार्य है।
विशेषज्ञ का नज़रिया: मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब रूस-यूक्रेन और इज़राइल-ईरान जैसे युद्धों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था और शांति खतरे में है। उनका यह संबोधन भारत को एक ‘विश्व गुरु’ और ‘मध्यस्थ’ के रूप में स्थापित करने की आरएसएस की दीर्घकालिक सोच को दर्शाता है।
