संसद में हल्के अंदाज में सलाह: निर्मला सीतारमण बोलीं- चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ की जगह ‘विदुर’ नाम जोड़ें!
संसद में हल्के अंदाज में सलाह: निर्मला सीतारमण बोलीं- चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ की जगह ‘विदुर’ नाम जोड़ें!
नई दिल्ली: लोकसभा में बजट सत्र के दौरान शुक्रवार (13 मार्च 2026) को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक हल्के-फुल्के अंदाज में उत्तर प्रदेश के नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी-कांशीराम) को नाम बदलने की सलाह दे डाली। उन्होंने चंद्रशेखर से कहा कि अपने नाम के साथ ‘रावण’ की बजाय ‘विदुर’ जोड़ना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि महाभारत के बुद्धिमान पात्र महर्षि विदुर का संबंध उनके क्षेत्र बिजनौर से जुड़ा है। इस पर सदन में ठहाके लगे, और चंद्रशेखर ने हाथ जोड़कर प्रतिक्रिया दी।
क्या हुआ सदन में?
पूरक मांगों पर बहस का जवाब देते हुए सीतारमण ने महाभारत काल का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “मुझे हाल ही में पता चला कि महर्षि विदुर, जो महाभारत में अपनी बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता के लिए जाने जाते हैं, ने अपने अंतिम वर्ष बिजनौर में बिताए। कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद वो वहां ‘रिटायरमेंट होम’ की तरह रहे।”
फिर उन्होंने चंद्रशेखर आजाद की ओर इशारा करते हुए कहा, “चंद्रशेखर जी ने अपने नाम में ‘रावण’ जोड़ा है, जबकि विदुर जैसे विद्वान पात्र का नाम जोड़ना ज्यादा बेहतर होगा। चंद्रशेखर ‘विदुर’ – ये सुनने में कितना अच्छा लगता है!”
सत्ता पक्ष के सदस्यों ने तालियां बजाईं और ‘विदुर’ शब्द दोहराया। चंद्रशेखर ने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ लिए, लेकिन कोई जवाब नहीं दिया।
गौरतलब है कि चंद्रशेखर आजाद अक्सर अपने नाम के साथ ‘रावण’ जोड़ते हैं, जो उनके राजनीतिक और सामाजिक संदेश का हिस्सा है – रावण को एक विद्वान और शक्तिशाली योद्धा के रूप में देखते हुए।
क्यों दिया ये सुझाव?
सीतारमण का कहना था कि ये सलाह उनके क्षेत्र की ऐतिहासिक महत्व को बढ़ावा देगी। बिजनौर (जिसमें नगीना आता है) को महर्षि विदुर से जोड़ा जाता है, जो महाभारत में हस्तिनापुर के मंत्री थे और अपनी नीतियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
ये मोमेंट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है – कई लोग इसे ‘फनी’ बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे ‘राजनीतिक टिप्पणी’ मान रहे हैं।
प्रतिक्रियाएं क्या हैं?
आजाद समाज पार्टी के सूत्रों का कहना है कि चंद्रशेखर ने इसे हल्के में लिया, लेकिन नाम बदलने का कोई इरादा नहीं है। वो ‘रावण’ को दलित-बहुजन आइकॉन के रूप में देखते हैं।
विपक्षी सदस्यों ने इसे ‘अनावश्यक’ बताया, जबकि बीजेपी ने इसे ‘सदन की हल्की-फुल्की बहस’ कहा।
ये घटना सदन में हंसी-मजाक का हिस्सा बनी, लेकिन ये चंद्रशेखर की राजनीतिक पहचान पर भी रोशनी डालती है। क्या आपको लगता है ये सलाह सही थी या सिर्फ एक जोक? कमेंट में बताएं।
