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युद्ध से इंटरनेट ब्लैकआउट का खतरा: समंदर के नीचे से गुजरता है 95% से ज्यादा वैश्विक इंटरनेट

युद्ध से इंटरनेट ब्लैकआउट का खतरा: समंदर के नीचे से गुजरता है 95% से ज्यादा वैश्विक इंटरनेट

ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध अब सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं रहा—यह डिजिटल दुनिया को भी खतरे में डाल रहा है। दुनिया का 95% से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक (कुछ रिपोर्ट्स में 99% तक) समुद्री सबमरीन फाइबर ऑप्टिक केबल्स (undersea cables) से गुजरता है, जो महासागरों के तल पर बिछी हुई हैं। इनमें से कई महत्वपूर्ण केबल्स होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) और रेड सी से होकर गुजरती हैं—दोनों ही इलाके अब युद्ध क्षेत्र बन चुके हैं।

क्यों है इतना बड़ा खतरा?

95-99% वैश्विक इंटरनेट इन केबल्स पर निर्भर: सैटेलाइट सिर्फ 1% से कम ट्रैफिक हैंडल करते हैं। ये केबल्स इंटरनेट, बैंकिंग, क्लाउड सर्विसेज, वीडियो स्ट्रीमिंग और सरकारी संचार का बैकबोन हैं।

होर्मुज और रेड सी चोक पॉइंट्स:

होर्मुज से कई केबल्स गुजरती हैं, जो UAE, कुवैत, बहरीन, कतर और ईरान को कनेक्ट करती हैं।

रेड सी में 17+ प्रमुख केबल सिस्टम्स हैं, जो यूरोप, एशिया, अफ्रीका और मिडिल ईस्ट को जोड़ती हैं।

युद्ध के कारण:

ईरान ने होर्मुज को बंद कर दिया है, जहाजों पर हमले हो रहे हैं।

हूती (ईरान समर्थित) ने रेड सी में शिपिंग पर हमले फिर से शुरू कर दिए।

दोनों इलाकों में कमर्शियल जहाज बंद हैं, जिससे रिपेयर शिप्स भी नहीं पहुंच पा रही हैं। अगर कोई केबल कट गई या डैमेज हुई, तो महीनों लग सकते हैं ठीक करने में।

हालिया रिपोर्ट्स:

ईरान में इंटरनेट ब्लैकआउट पहले से ही है (केवल 4% नॉर्मल लेवल पर)।

गल्फ में बिग टेक के AI और डेटा सेंटर्स (UAE, सऊदी) पर असर पड़ सकता है, क्योंकि उनकी कनेक्टिविटी इन चोक पॉइंट्स से गुजरती है।

भारत के लिए भी रिस्क: भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप रूट्स इन केबल्स पर निर्भर हैं। अगर डिसरप्शन हुआ, तो लेटेंसी बढ़ेगी, कुछ सर्विसेज डाउन हो सकती हैं।

क्या हो सकता है ब्लैकआउट?

शॉर्ट टर्म: अगर केबल्स डैमेज हुईं (एंकर, हमले या एक्सीडेंट से), तो मिडिल ईस्ट, एशिया और यूरोप के बीच ट्रैफिक प्रभावित होगा। ग्लोबल क्लाउड (AWS, Google, Meta) में डिले या आउटेज।

लॉन्ग टर्म: रिपेयर में 2-3 महीने लग सकते हैं, क्योंकि युद्ध क्षेत्र में काम मुश्किल।

साइबर रिस्क: ईरान से जुड़े ग्रुप्स DDoS या अन्य अटैक कर सकते हैं, लेकिन फिजिकल केबल कट सबसे बड़ा खतरा है।

क्या तैयारी हो रही है?

कंपनियां अल्टरनेटिव रूट्स (जैसे अफ्रीका के आसपास) पर स्विच कर रही हैं।

भारत और अन्य देश डाइवर्सिफिकेशन पर फोकस कर रहे हैं।

लेकिन अभी कोई पूर्ण ब्लैकआउट नहीं हुआ—सिर्फ रिस्क बहुत बढ़ गया है।

यह युद्ध अब सिर्फ तेल नहीं, बल्कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी खतरे में डाल रहा है। अगर केबल्स प्रभावित हुईं, तो वैश्विक इंटरनेट का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है।

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