एसिड अटैक पीड़ितों को मिले नौकरी या गुजारा भत्ता: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को पॉलिसी बनाने का दिया निर्देश
एसिड अटैक पीड़ितों को मिले नौकरी या गुजारा भत्ता: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को पॉलिसी बनाने का दिया निर्देश
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज (9 मार्च 2026) एसिड अटैक पीड़ितों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे 6 महीने के भीतर एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए नौकरी आरक्षण या गुजारा भत्ता (maintenance allowance) की स्पष्ट नीति बनाएं। कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों को जीवन जीने लायक सम्मानजनक आजीविका का अधिकार है और मौजूदा योजनाएं अपर्याप्त हैं।
मामला क्या था?
यह फैसला एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल और अन्य पीड़ितों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। याचिका में मांग की गई थी कि एसिड अटैक सर्वाइवर्स को सरकारी नौकरियों में आरक्षण, पेंशन या मासिक गुजारा भत्ता दिया जाए, क्योंकि कई पीड़ित शारीरिक अक्षमता और सामाजिक बहिष्कार के कारण रोजगार पाने में असमर्थ रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा: “एसिड अटैक पीड़ितों को सिर्फ मुआवजा या मेडिकल सहायता ही नहीं, बल्कि आजीविका का स्थायी स्रोत भी मिलना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों को 6 महीने में एक समान नीति बनानी होगी, जिसमें नौकरी में आरक्षण या मासिक गुजारा भत्ता शामिल हो।”
कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि एसिड अटैक को ‘दिव्यांगता’ के दायरे में क्यों नहीं लाया जा रहा, जबकि कई पीड़ित स्थायी रूप से अक्षम हो जाते हैं।
बेंच ने मौजूदा मुआवजा (केंद्र सरकार द्वारा 3-8 लाख रुपये) को “एकमुश्त” बताते हुए कहा कि यह लंबे समय तक जीविका के लिए पर्याप्त नहीं है।
मुख्य निर्देश
केंद्र सरकार को 6 महीने में राष्ट्रीय नीति तैयार करने का आदेश।
राज्यों को अपनी नीतियां बनानी होंगी, जिसमें नौकरी आरक्षण (सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में) या मासिक भत्ता (₹10,000-₹20,000 तक) शामिल हो।
पीड़ितों को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत लाभ देने पर विचार।
कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि एसिड अटैक के मामलों में सजा और मुआवजा क्यों कमजोर है, और एसिड बिक्री पर सख्ती क्यों नहीं हो रही।
पीड़ितों और एक्टिविस्ट्स की प्रतिक्रिया
एसिड अटैक सर्वाइवर और एक्टिविस्ट लक्ष्मी अग्रवाल ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा: “यह फैसला पीड़ितों के लिए नई उम्मीद है। अब हमें सिर्फ दया नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का हक मिलेगा।” कई एनजीओ ने कहा कि यह फैसला 2013 के बाद से चली आ रही मांग को पूरा करने की दिशा में बड़ा कदम है।
वर्तमान स्थिति
केंद्र सरकार ने कोर्ट के निर्देश पर अमल करने का आश्वासन दिया है।
कई राज्यों (जैसे दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश) में पहले से कुछ योजनाएं हैं, लेकिन वे असमान और अपर्याप्त हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 6 महीने बाद फिर सूचीबद्ध करने का आदेश दिया, ताकि नीति की प्रगति पर नजर रखी जा सके।
यह फैसला एसिड अटैक पीड़ितों के अधिकारों को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। अब केंद्र और राज्यों पर नीति बनाने का दबाव बढ़ गया है।
