राजनीति

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष का बड़ा कदम: क्या पद छोड़ना पड़ेगा? प्रक्रिया और संभावनाएं

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष का बड़ा कदम: क्या पद छोड़ना पड़ेगा? प्रक्रिया और संभावनाएं

नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत आज (9 मार्च 2026) से हो रही है और इसका सबसे गर्म मुद्दा लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने का प्रस्ताव बन गया है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने ओम बिरला पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाते हुए अविश्वास प्रस्ताव (removal motion) का नोटिस दिया था, जिस पर आज लोकसभा में चर्चा और संभावित वोटिंग हो सकती है।

विपक्ष का मुख्य आरोप है कि स्पीकर ने विपक्षी सांसदों, खासकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने का उचित मौका नहीं दिया, सत्ताधारी बीजेपी सांसदों की अनुचित टिप्पणियों पर कोई कार्रवाई नहीं की और विपक्षी महिला सांसदों के खिलाफ बिना आधार के आरोपों को नजरअंदाज किया। इस प्रस्ताव का नोटिस कांग्रेस के तीन सांसदों—मोहम्मद जावेद, के. सुरेश और मल्लू रवि—ने दिया था, जिसके समर्थन में 118 से अधिक विपक्षी सांसदों के हस्ताक्षर हैं। टीएमसी ने भी अब इस प्रस्ताव का समर्थन करने का ऐलान कर दिया है।

प्रक्रिया क्या है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रावधान है। पूरी प्रक्रिया इस प्रकार है:

प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस लोकसभा महासचिव को देना जरूरी है।

प्रस्ताव पर चर्चा शुरू करने के लिए सदन में कम से कम 50 सांसदों का समर्थन (खड़े होकर) जरूरी है।

अगर इतने सांसद समर्थन में खड़े होते हैं, तो चर्चा होती है और स्पीकर खुद अपना बचाव कर सकते हैं (वे कुर्सी पर नहीं बैठते, लेकिन सदन में मौजूद रह सकते हैं)।

अंत में वोटिंग होती है, जिसमें स्पीकर को हटाने के लिए लोकसभा की कुल सदस्य संख्या (वर्तमान में 543) की साधारण बहुमत यानी कम से कम 272 वोट चाहिए (absolute majority of all then members)।

ओम बिरला ने नोटिस मिलने के बाद सदन की कार्यवाही संचालित नहीं की और खुद कुर्सी से दूर रहने का फैसला किया है, ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष रहे।

पास होने की संभावनाएं कितनी?

वर्तमान लोकसभा में एनडीए (बीजेपी नीत) के पास मजबूत बहुमत है। विपक्ष के पास करीब 118-120 सांसदों का समर्थन है, लेकिन 272 का आंकड़ा छूना उनके लिए लगभग असंभव दिख रहा है। एनडीए के पास 290+ सांसद हैं, इसलिए प्रस्ताव के पास होने की संभावना बहुत कम है। इतिहास में भी ऐसे तीन प्रयास (1954, 1966, 1987) हुए, लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव मुख्य रूप से राजनीतिक दबाव और मुद्दा बनाने के लिए लाया गया है, न कि वास्तविक हटाने के लिए।

आज सदन में हंगामा और तीखी बहस की उम्मीद है, क्योंकि दोनों पक्षों ने अपने सांसदों को तीन लाइन व्हिप जारी किया है। यह सत्र संसद में सत्ता-विपक्ष के टकराव का नया अध्याय साबित हो सकता है।

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