मिडिल ईस्ट संकट: संसद में कल घमासान, विदेश मंत्री जयशंकर दोनों सदनों में देंगे बयान
नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान तथा अमेरिका-इजरायल के बीच चल रही जंग का मुद्दा भारतीय संसद के बजट सत्र में छाया रह सकता है। विदेश मंत्री एस जयशंकर कल (9 मार्च, 2026) लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में इस मुद्दे पर बयान देंगे। सरकार ने अपने सांसदों और मंत्रियों को बयान देते समय संयम बरतने की सलाह दी है, ताकि अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर कोई नकारात्मक असर न पड़े। वहीं, विपक्षी दल भारत की ऊर्जा जरूरतों, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और आर्थिक प्रभावों को लेकर सरकार पर हमलावर होने की तैयारी में हैं।
पृष्ठभूमि और मौजूदा स्थिति:
पिछले कुछ महीनों से मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर है। ईरान ने इजरायल पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं, जिसके जवाब में अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त कार्रवाई की है। यह संघर्ष गाजा युद्ध से जुड़ा हुआ है, जो 2023 से चल रहा है और अब क्षेत्रीय स्तर पर फैल चुका है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स के अनुसार, इस जंग में अब तक हजारों नागरिकों की मौत हो चुकी है, और वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो रहा है। भारत, जो अपनी 80% से ज्यादा कच्चे तेल की जरूरत आयात पर निर्भर है, इस तनाव से सीधे प्रभावित हो रहा है। तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा है।
संसद में क्या होने वाला है?
बजट सत्र के दौरान विपक्षी दलों जैसे कांग्रेस, टीएमसी और डीएमके ने नोटिस दिए हैं कि वे मिडिल ईस्ट संकट पर चर्चा की मांग करेंगे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा है, “भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में है। सरकार को स्पष्ट नीति बतानी चाहिए कि कैसे हम ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों से संबंध बनाए रखेंगे।” वहीं, टीएमसी की महुआ मोइत्रा ने भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि मिडिल ईस्ट में लाखों भारतीय काम करते हैं।
सरकार की ओर से, विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया है कि भारत ‘शांति और संवाद’ की नीति पर कायम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति और इजरायली पीएम से फोन पर बात की थी, जबकि ईरान के साथ भी राजनयिक चैनल खुले हैं। बीजेपी सांसदों को निर्देश दिए गए हैं कि वे बयानों में ‘राष्ट्रीय हित’ को प्राथमिकता दें और कोई भड़काऊ टिप्पणी न करें।
विपक्ष का हमला और सरकार की रणनीति:
विपक्ष का मुख्य फोकस भारत की ऊर्जा जरूरतों पर है। वे आरोप लगा रहे हैं कि सरकार ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों (जैसे रिन्यूएबल एनर्जी) पर पर्याप्त निवेश नहीं किया, जिससे तेल संकट में देश कमजोर पड़ा है। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट में फंसे भारतीयों को निकालने की योजना पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सरकार ने ‘ऑपरेशन अजेय’ के तहत पहले ही 5,000 से ज्यादा नागरिकों को सुरक्षित निकाला है, लेकिन विपक्ष इसे अपर्याप्त बता रहा है।
विदेश मंत्री जयशंकर के बयान में भारत की ‘तटस्थता’ पर जोर दिया जाएगा। वे सदनों में बताएंगे कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र में शांति प्रस्ताव का समर्थन किया है और सभी पक्षों से संवाद जारी रखा है। हालांकि, संसद में हंगामे के आसार हैं, क्योंकि विपक्ष स्थगन प्रस्ताव लाने की योजना बना रहा है।
आर्थिक और वैश्विक प्रभाव:
यह संकट भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। स्टॉक मार्केट में गिरावट आई है, और रुपया डॉलर के मुकाबले 85 तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जंग लंबी चली, तो भारत को रूस और वेनेजुएला जैसे देशों से तेल आयात बढ़ाना पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, चीन और रूस ईरान के साथ खड़े हैं, जबकि अमेरिका-इजरायल गठबंधन मजबूत है। भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति यहां परीक्षा की घड़ी में है।
संसद सत्र कल सुबह 11 बजे से शुरू होगा। क्या सरकार विपक्ष के सवालों का संतोषजनक जवाब दे पाएगी, या घमासान और बढ़ेगा? अपडेट्स के लिए बने रहें।
