भस्म की अनोखी होली में झूमे शिव भक्त—काशी विश्वनाथ मंदिर में एक-दूसरे पर भस्म लगाकर मनाई खुशी, चंद्रग्रहण के कारण एक दिन पहले हुआ आयोजन!
उत्तरकाशी: भस्म की अनोखी होली में झूमे शिव भक्त—काशी विश्वनाथ मंदिर में एक-दूसरे पर भस्म लगाकर मनाई खुशी, चंद्रग्रहण के कारण एक दिन पहले हुआ आयोजन!
उत्तरकाशी: सीमांत जिला उत्तरकाशी में रंगभरी होली से पहले एक अनूठी और आध्यात्मिक परंपरा निभाई गई—भस्म की होली! उत्तरकाशी शहर के प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में सोमवार (2 मार्च 2026) को शिव भक्तों ने एक-दूसरे पर भस्म लगाकर नाचते-झूमते होली मनाई। यह परंपरा पिछले करीब 10 सालों से हर साल होली से ठीक पहले निभाई जा रही है, लेकिन इस बार चंद्रग्रहण के कारण एक दिन पहले आयोजित की गई।
कैसे मनाई गई भस्म होली?
सुबह की आरती के बाद सबसे पहले स्वयंभू शिवलिंग पर हवन कुंड और धूनी को भस्म लगाकर आशीर्वाद लिया गया।
मंदिर के महंत ने स्वाति वाचन के साथ हवा में भस्म उड़ाकर भस्म होली की शुरुआत की।
वर्ष भर मंदिर में होने वाले यज्ञों की भस्म को श्रद्धालु एक-दूसरे पर लगाते हैं और प्रसाद के रूप में घर भी ले जाते हैं।
ढोल-दमाऊ की थाप पर लोग रासो तांदी नृत्य में थिरके, जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठा।
बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी और श्रद्धालु शामिल हुए, जिसने भाईचारे और वैराग्य का संदेश दिया—भस्म लगाने से नश्वरता की याद दिलाई जाती है और संकट दूर होने की मान्यता है।
यह परंपरा उज्जैन के महाकाल मंदिर की तर्ज पर शुरू हुई है, जहां भस्म को शिव का प्रतीक मानकर होली खेली जाती है। उत्तरकाशी का काशी विश्वनाथ मंदिर देश के प्रमुख शिव मंदिरों में से एक है, और भस्म होली यहां की खास पहचान बन चुकी है।
श्रद्धालुओं ने कहा कि यह होली रंगों से ज्यादा आस्था और भक्ति से भरी होती है—एक तरह से बुराई पर अच्छाई और अहंकार पर वैराग्य की जीत! होली का यह अनोखा रूप देखकर फैंस और पर्यटक भी हैरान हैं।
