उत्तराखंड

केदारनाथ यात्रा से पहले कूड़ा प्रबंधन पर रार: व्यापारियों ने चेताया, प्रशासन की लापरवाही से जंगलों और नालों में उमड़ रहा कचरा

केदारनाथ यात्रा शुरू होने से पहले स्वच्छता और कूड़ा प्रबंधन को लेकर व्यापारियों और ग्रामीणों की यह चिंता बेहद गंभीर है। आस्था के इस प्रमुख केंद्र पर पर्यावरण की अनदेखी न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा है, बल्कि वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच संघर्ष (Man-Animal Conflict) को भी बढ़ावा दे रही है।

मुख्य समस्याएं: एक नजर में

* अवैज्ञानिक निस्तारण: सफाई कर्मियों द्वारा कूड़े को सीधे नदी-नालों या जंगलों में फेंकना।

* सीमित संसाधन: यात्रा के दौरान कूड़ा उठाने वाले वाहनों की संख्या और क्षमता का कम होना।

* वन्यजीवों का खतरा: जंगलों में बिखरे कूड़े के कारण भालू जैसे जंगली जानवरों का आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आकर्षित होना।

* अस्थायी डंपिंग जोन: शेरसी जैसे क्षेत्रों में बनाए गए अस्थायी डंपिंग साइट्स का समय पर निस्तारण न होना, जिससे स्थानीय लोगों को कूड़ा जलाने पर मजबूर होना पड़ा।

व्यापार संघ और ग्रामीणों की प्रमुख मांगें

व्यापारियों ने जिला प्रशासन से निम्नलिखित ठोस व्यवस्थाएं लागू करने की मांग की है:

* स्थायी संग्रहण केंद्र: प्रत्येक मुख्य यात्रा पड़ाव (जैसे गौरीकुंड, सोनप्रयाग, फाटा आदि) पर पक्के कूड़ा कलेक्शन सेंटर बनाए जाएं।

* नियमित वाहन व्यवस्था: कूड़ा उठाने वाले वाहनों की संख्या बढ़ाई जाए और उनके आने का समय निश्चित हो।

* वैज्ञानिक निस्तारण: कूड़े को केवल डंप न किया जाए, बल्कि उसका वैज्ञानिक विधि से (Recycling या Incineration) निस्तारण हो।

* जवाबदेही: जिला पंचायत और सफाई कर्मियों की निगरानी हो ताकि कूड़ा नालों में न फेंका जाए।

प्रशासन का रुख

जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए स्पष्ट किया है कि:

“यात्रा मार्ग पर सफाई व्यवस्था में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संबंधित अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए गए हैं और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।”

यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 22 अप्रैल से पहले प्रशासन इन मांगों पर कितनी तेजी से जमीनी स्तर पर काम करता है, ताकि केदारघाटी की पवित्रता और स्वच्छता बनी रहे।

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