Thursday, September 10, 2026
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उत्तराखंड के ‘भूतिया गांव’ धूर में अनिल बलूनी ने मनाई होली: पलायन से वीरान बस्तियों को फिर से आबाद करने का संकल्प, पुराने लोग लौटे और रंगों का त्योहार मनाया

उत्तराखंड के ‘भूतिया गांव’ धूर में अनिल बलूनी ने मनाई होली: पलायन से वीरान बस्तियों को फिर से आबाद करने का संकल्प, पुराने लोग लौटे और रंगों का त्योहार मनाया

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में पलायन की मार से ‘घोस्ट विलेज’ या ‘भूतिया गांव’ बन चुके धूर गांव में गढ़वाल लोकसभा सांसद और बीजेपी नेता अनिल बलूनी ने स्थानीय निवासियों और बाहर से लौटे पुराने लोगों के साथ होली खेली। इस मौके पर लगभग खाली पड़े गांव में ढोल-दमाऊ की थाप, रंगों की बौछार और हंसी-मजाक से रौनक लौट आई। कई परिवार शहरों से होली मिलन के लिए गांव पहुंचे, जिससे पुरानी यादें ताजा हो गईं और बीते हुए समय की झलक मिली।

अनिल बलूनी ने कहा कि बचपन से उन्होंने गांवों को वीरान होते देखा है, क्योंकि लोग रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर गए। आज उत्तराखंड में सैकड़ों ऐसे गांव ‘भूतिया’ कहलाते हैं, जहां सीढ़ीदार खेत जंगली घास-फूस से ढक गए हैं और घर बंद-टूटे-फूटे पड़े हैं। उन्होंने बताया कि पौड़ी जिले में ही करीब 150 ऐसे गांव हैं, और पलायन से विधानसभा सीटों की संख्या भी घटकर 8 से 6 रह गई है – अगले डीलिमिटेशन में और कम हो सकती है।

बलूनी 2024 में लोकसभा चुनाव जीतने से पहले राज्यसभा सदस्य थे। वे PM नरेंद्र मोदी के आह्वान पर पारंपरिक त्योहारों को फिर से जीवित करने और पुराने लोगों को गांव लौटाने के कैंपेन चला रहे हैं। बेहतर सड़कें, बिजली, पानी और अन्य सुविधाओं के साथ अब जड़ों की ओर लौटने का समय है, जहां हमारी सांस्कृतिक विरासत फल-फूल सकती है।

इस कैंपेन के तहत उन्होंने ‘अपना वोट अपने गांव’ अभियान भी शुरू किया है, जिसमें प्रवासियों से अपील की गई है कि वे पैतृक गांव में वोटर रजिस्टर कराएं। बलूनी बार-बार ऐसे गांवों का दौरा कर रहे हैं ताकि दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में पुरानी जीवनशैली फिर से शुरू हो सके।

होली के इस उत्सव ने न सिर्फ गांव में जीवन फूंका, बल्कि रिवर्स माइग्रेशन और विरासत बचाने की उम्मीद जगाई। उत्तराखंड के पहाड़ों में ऐसी पहलें जारी रहेंगी।

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