उत्तराखंड: गांधी पार्क में इंडिया गठबंधन का धरना, हरीश रावत ने महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने रखा 1 घंटे का मौन उपवास
उत्तराखंड: गांधी पार्क में इंडिया गठबंधन का धरना, हरीश रावत ने महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने रखा 1 घंटे का मौन उपवास – बिंदू खत्ता, इंदिरा ग्रामों को राजस्व गांव दर्जा देने की मांग तेज
उत्तराखंड में भूमिहीनों, आपदा पीड़ितों और वन भूमि पर बसे लोगों के मालिकाना हक की मांग को लेकर इंडिया गठबंधन के घटक दलों ने आज देहरादून के गांधी पार्क में बड़ा धरना-प्रदर्शन किया। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने 1 घंटे का मौन उपवास रखा और राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। प्रदर्शन में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य सहयोगी दलों के नेता शामिल हुए, जहां हजारों प्रभावित परिवारों ने भाग लिया।
मुख्य मांगें और हरीश रावत के बयान:
बिंदू खत्ता, बापूग्राम, पुछड़ी, बागजाला, गुलरानी टोंगिया समेत इंदिरा ग्रामों, गांधी ग्रामों, हरि ग्रामों और टोंगिया गांवों/खत्तों/गोठों को राजस्व गांव का दर्जा दिया जाए।
कांग्रेस सरकार के समय (26 दिसंबर 2016) मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए निर्णय में शामिल 10 बिंदुओं के लाभार्थियों को तुरंत भूमिधरी अधिकार दिए जाएं।
टिहरी डैम विस्थापितों और वनों में विस्थापित वन गुज्जरों को आवंटित भूमि का मालिकाना हक दिया जाए।
उधम सिंह नगर, देहरादून, हरिद्वार जैसे जिलों में मलिन बस्तियों और वन भूमि पर बसे लोगों को अतिक्रमणकारी बताकर उजाड़ने के बजाय मालिकाना हक दिया जाए। वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई।
हरीश रावत ने कहा: “राज्य के सामने ऐसी समस्याएं खड़ी हो गई हैं कि लाखों लोगों के सामने अपनी छत, परिवार और जीवन भर की पूंजी-श्रम बचाने का सवाल है। इसका समाधान केवल राज्य सरकार के पास है। कांग्रेस सरकारों ने समय-समय पर निर्णय लिए, लेकिन अब आगे नहीं बढ़ाए जा रहे। वनाधिकार कानून (FRA) के तहत भी ऐसे गांवों को राजस्व गांव का दर्जा दिया जा सकता है। सरकार विकास या राजनीतिक एजेंडे के नाम पर इन्हें उजाड़ रही है।”
इंडिया गठबंधन का ज्ञापन:
गठबंधन ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को ज्ञापन भेजा है, जिसमें 2016 के निर्णय को लागू करने, भूमिधरी अधिकार देने और विस्थापितों के हक की मांग की गई है।
रावत ने कहा कि यदि सरकार गंभीरता नहीं दिखाती, तो आंदोलन और तेज होगा। यह सिर्फ भूमिहीनों की लड़ाई है – जिनकी जमीन पर छत है, लेकिन मालिकाना हक नहीं।
पृष्ठभूमि:
ये गांव/बस्तियां पुरानी बसावटें हैं, जो जंगल व्यवस्था के समय बनीं। लोग दशकों से इन्हें आबाद कर रहे हैं, लेकिन राजस्व दर्जा न मिलने से अतिक्रमण का खतरा है।
बिंदुखत्ता जैसे इलाकों में पहले भी बड़े आंदोलन हो चुके हैं, जहां हरीश रावत ने “लाश से गुजरना पड़ेगा” जैसी चेतावनी दी थी।
प्रदर्शन में प्रभावित परिवारों ने कहा कि सरकार उजाड़ रही है, लेकिन कोई विकल्प नहीं दे रही।
