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दिल्ली की यमुना और देहरादून की सुसवा: प्रदूषण की एक जैसी कहानी, विकास की भारी कीमत

दिल्ली की यमुना और देहरादून की सुसवा: प्रदूषण की एक जैसी कहानी, विकास की भारी कीमत

नदियां पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं—पानी, सिंचाई, पेयजल, जैव विविधता और मानव सभ्यता की नींव। लेकिन आज “अभूतपूर्व विकास” के नाम पर नदियां जहरीली हो रही हैं। आपने बिल्कुल सही कहा: दिल्ली की यमुना लंबे समय से प्रदूषण की मिसाल है—झाग, काला पानी, बदबू, प्लास्टिक और सीवर का मिश्रण। लेकिन अब देहरादून की सुसवा नदी भी उसी राह पर है। कभी साफ-सुथरी, बहती हुई यह नदी आज शहर के बीचों-बीच नाले में बदल चुकी है।

CPCB रिपोर्ट से खुलासा: उत्तराखंड की 12 नदियां प्रदूषित

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने उत्तराखंड की नदियों की पानी की गुणवत्ता की जांच की। 17 नदियों को 44 जगहों पर मॉनिटर किया गया, जिसमें 12 नदियों के 23 स्थानों पर BOD (Biochemical Oxygen Demand) के मानक से काफी ज्यादा प्रदूषण पाया गया। BOD ज्यादा होने का मतलब है ऑक्सीजन की कमी—मछलियां, जलीय जीव मर जाते हैं, पानी जहरीला हो जाता है।

प्रदूषित नदियों की सूची:

सुसवा (देहरादून)

बाणगंगा

भेलला

ढेला

कल्याणी

टोंस

किच्छा

कोसी

पिलखर

रामगंगा

यमुना

नंदोउर

ये नदियां गंगा बेसिन की सहायक हैं, लेकिन अब सीवर, कूड़ा, औद्योगिक कचरा और प्लास्टिक से भरी पड़ी हैं। CPCB की 2025 रिपोर्ट में प्रदूषित रिवर स्ट्रेचेस (PRS) की संख्या भारत में कम हुई है (351 से 279), लेकिन उत्तराखंड में सुसवा जैसी नदियां अभी भी Priority I-V कैटेगरी में हैं।

सुसवा नदी: देहरादून का ‘दूसरा यमुना’ बन गई

एनडीटीवी की ग्राउंड रिपोर्ट (फरवरी 2026) में सुसवा का हाल देखकर सदमा लगता है:

पानी काला, बदबूदार, झाग भरा।

प्लास्टिक बोतलें, थर्मोकोल, कपड़े, फॉर्म, कूड़ा-कचरा हर तरफ बिखरा।

मरे हुए जानवरों के अवशेष भी दिखे।

शहर का सीवर, छोटी फैक्टरियों का केमिकल वेस्ट और घरेलू कचरा सीधे नदी में गिरता है।

स्थानीय लोग बताते हैं: “पहले इसमें साफ पानी था, नहाते थे, मछलियां पकड़ते थे। अब जानलेवा बन गई है।”

सुसवा राजाजी नेशनल पार्क से होकर गुजरती है, लेकिन प्रदूषण यहां तक पहुंच चुका है—हाथियों को प्लास्टिक खाने की खबरें पहले भी आई हैं। SPECS (Society of Pollution and Environmental Conservation Scientists) की जांच में BOD और COD के स्तर बेहद ऊंचे पाए गए, जो कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ा रहे हैं।

क्यों हो रहा है यह सब?

तेज urbanization और अनियोजित विकास।

सीवर ट्रीटमेंट प्लांट्स (STP) की कमी या खराब कामकाज।

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का अभाव—कूड़ा नदी में फेंका जाता है।

छोटी इंडस्ट्रीज का अनट्रिटेड वेस्ट।

जन जागरूकता की कमी।

उत्तराखंड सरकार और UPCB ने कुछ एक्शन प्लान बनाए हैं (जैसे Mothrowala से Raiwala तक सुसवा के लिए), लेकिन अमल धीमा है। NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) में भी केस चल रहे हैं।

क्या किया जा सकता है?

सीवर और इंडस्ट्रियल वेस्ट का ट्रीटमेंट अनिवार्य।

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सुधारें।

नदी किनारे बफर जोन, प्लांटेशन और कम्युनिटी क्लीनअप।

लोगों को जागरूक करें—नदी सिर्फ पानी नहीं, जीवन है।

यह सिर्फ सुसवा या यमुना की कहानी नहीं—यह पूरे देश की नदियों की चेतावनी है। विकास जरूरी है, लेकिन नदियों को मारकर नहीं। अगर हम अब नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ जहरीला पानी पीकर रह जाएंगी।

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