UGC इक्विटी रेगुलेशन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: कुछ नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं, जानें क्या कहा
UGC इक्विटी रेगुलेशन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक: अखिलेश यादव, मायावती, गिरिराज सिंह सहित नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं, जानें क्या कहा
नई दिल्ली, 29 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने आज UGC के नए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस 2026’ पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने इन नियमों को ‘प्राइमा फेसी अस्पष्ट (vague)’ और ‘दुरुपयोग की संभावना से भरा’ बताते हुए केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया। नियमों को रीड्राफ्ट करने का निर्देश दिया गया है, तब तक 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे। यह फैसला जाति-आधारित भेदभाव रोकने के नाम पर जारी UGC नियमों के खिलाफ व्यापक विरोध और याचिकाओं के बाद आया है।
फैसले के तुरंत बाद राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। विभिन्न दलों ने अलग-अलग नजरिए से इस रोक का स्वागत या आलोचना की:
अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी अध्यक्ष): फैसले का स्वागत करते हुए X पर पोस्ट किया, “सच्ची न्याय किसी के साथ अन्याय नहीं है। कानून की भाषा साफ होनी चाहिए और नीयत भी। इससे अन्याय और सामाजिक विभाजन रोका जा सकता है।” उन्होंने कहा कि नियमों में स्पष्टता जरूरी है ताकि कोई निर्दोष प्रभावित न हो।
मायावती (बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो): उन्होंने फैसले को “उचित” बताया। कहा कि नए नियमों से सामाजिक तनाव का माहौल बना था। उन्होंने जोर दिया कि नियमों का उद्देश्य समानता और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित होना चाहिए था, लेकिन व्यापक परामर्श की कमी से विवाद हुआ।
गिरिराज सिंह (केंद्रीय मंत्री, भाजपा): X पर लिखा, “सुप्रीम कोर्ट का हृदय से आभार, जिन्होंने UGC नियमों पर रोक लगाकर सनातन धर्म को बांटने वाली व्यवस्था रोकी।” उन्होंने इसे सनातन मूल्यों और भारत की सांस्कृतिक एकता की रक्षा बताया।
अन्य विपक्षी नेता: कांग्रेस, टीएमसी और सीपीआई(एमएल) जैसे दलों ने भी फैसले पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं दीं। टीएमसी के कल्यान बनर्जी ने इसे “असंवैधानिक नियमों” के खिलाफ सही कदम बताया। वहीं सीपीआई(एमएल) लिबरेशन ने कोर्ट की टिप्पणियों को “गहरा निराशाजनक” कहा, क्योंकि यह वंचित वर्गों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
DMK नेता टीकेएस इलंगोवन: इसे अंतरिम चरण बताया और कहा कि अंतिम बहस और फैसला महत्वपूर्ण होगा।
यह रोक UGC के उन नए नियमों पर लगी है, जो उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए थे, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों ने इन्हें भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताया। विरोध प्रदर्शन के बाद कोर्ट ने कहा कि शिक्षा संस्थान भारत की एकता का प्रतीक होने चाहिए, न कि विभाजन के।
अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी। इस बीच राजनीतिक बहस तेज है, जहां एक तरफ सामाजिक न्याय का मुद्दा है तो दूसरी तरफ नियमों के दुरुपयोग और अस्पष्टता का।
