कैसे चाचा शरद पवार की छाया से निकलकर अजित पवार बने महाराष्ट्र की राजनीति के बेताज बादशाह
कैसे चाचा शरद पवार की छाया से निकलकर अजित पवार बने महाराष्ट्र की राजनीति के बेताज बादशाह
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का आज सुबह बारामती में विमान हादसे में निधन हो गया, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा एक ऐसी कहानी है जो महत्वाकांक्षा, परिवारवाद, विद्रोह और सत्ता के खेल की मिसाल है। चाचा शरद पवार की छाया में पले-बढ़े अजित कैसे महाराष्ट्र की राजनीति के ‘बेताज बादशाह’ बने? यह सफर 1980 के दशक से शुरू होता है, जब वे सहकारी संस्थाओं से राजनीति में कदम रखते हैं और 2023 के विद्रोह तक पहुंचता है, जहां उन्होंने अपनी अलग राह चुनी।
शुरुआती सफर: सहकारी राजनीति से लोकसभा तक
अजित अनंतराव पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को बारामती में हुआ। चाचा शरद पवार, जो उस समय कांग्रेस के कद्दावर नेता थे, की छाया में वे बड़े हुए। 1982 में महज 23 साल की उम्र में अजित ने राजनीति में एंट्री की—पुणे जिले की एक चीनी सहकारी संस्था के बोर्ड में चुने गए। यह पश्चिमी महाराष्ट्र की सहकारी राजनीति का हिस्सा था, जहां पवार परिवार का दबदबा था।
1991 में पहला बड़ा ब्रेक मिला: बारामती लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते, लेकिन चाचा शरद पवार के लिए सीट खाली की ताकि वे केंद्र में मंत्री बन सकें। यह घटना अजित की वफादारी दिखाती है, लेकिन साथ ही छाया में रहने की शुरुआत भी। 1995 में वे बारामती विधानसभा से एमएलए चुने गए और लगातार 7 बार जीते।
डिप्टी सीएम का दौर: सत्ता की सीढ़ियां चढ़ना
शरद पवार के 1999 में कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) बनाने के बाद अजित को वारिस माना जाने लगा। उन्होंने 1999-2004, 2004-2009 और 2009-2014 के दौरान डिप्टी सीएम का पद संभाला। इस दौरान वे जल संसाधन, ग्रामीण विकास जैसे विभागों के मंत्री रहे और महाराष्ट्र में सिंचाई परियोजनाओं (जैसे 28,000 करोड़ का घोटाला आरोप, जो बाद में क्लीन चिट मिली) से अपनी पहचान बनाई।
लेकिन चाचा की छाया हमेशा बनी रही। अजित को ‘दादा’ कहा जाता था, लेकिन फैसले शरद पवार के ही होते थे। 2010 में वे एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष बने, लेकिन महत्वाकांक्षा बढ़ती गई। 2012 में उन्होंने इस्तीफा दिया था, लेकिन वापस लिए। 2019 में देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर 80 घंटे की सरकार बनाई, जो ‘विद्रोह’ की पहली झलक थी—हालांकि चाचा ने उन्हें वापस लाकर मामला सुलझाया।
2023 का विद्रोह: छाया से बाहर निकलना
अजित पवार की असली ‘क्रांति’ 2023 में हुई। जुलाई 2023 में उन्होंने एनसीपी में विद्रोह कर दिया—40 एमएलए अपने साथ लेकर शिंदे-फडणवीस सरकार में शामिल हो गए। चुनाव आयोग ने उन्हें असली एनसीपी माना और ‘घड़ी’ सिंबल दिया। यह कदम चाचा शरद पवार से सीधा टकराव था, जिन्होंने नई एनसीपी (शरदचंद्र पवार) बनाई।
क्यों किया विद्रोह? अजित ने कहा कि चाचा की बेटी सुप्रिया सुले को वारिस बनाने की तैयारी थी, जबकि वे खुद 40 साल से मेहनत कर रहे थे। इस विद्रोह ने उन्हें बीजेपी-शिवसेना गठबंधन में डिप्टी सीएम बनाया। 2024 विधानसभा चुनावों में उनकी एनसीपी ने 41 सीटें जीतीं, जबकि शरद गुट सिर्फ 10 पर सिमटा। अजित की रणनीति—ग्रामीण महाराष्ट्र में सहकारी नेटवर्क, किसान मुद्दे और विकास पर फोकस—ने उन्हें ‘बेताज बादशाह’ बनाया।
प्रमुख योगदान और विवाद
नीतियां: जल संरक्षण, सिंचाई स्कीम्स (जलयुक्त शिवार), ग्रामीण बिजली और कोऑपरेटिव बैंकों का विस्तार। उन्होंने महाराष्ट्र को ‘पावर सरप्लस’ बनाने में भूमिका निभाई।
विवाद: 2010 का सिंचाई घोटाला आरोप (क्लीन चिट), 2019 की ’80 घंटे सरकार’, और परिवारवाद के आरोप। लेकिन उनकी ‘डिलीवरी’ वाली इमेज ने उन्हें लोकप्रिय बनाया।
व्यक्तिगत छवि: कठोर, व्यावहारिक और महत्वाकांक्षी। बारामती उनका गढ़ रहा, जहां वे ‘दादा’ के रूप में पूजे जाते थे।
अजित पवार की मौत महाराष्ट्र राजनीति के लिए बड़ा झटका है। चाचा की छाया से निकलकर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई, लेकिन परिवार का विवाद कभी खत्म नहीं हुआ। उनकी यात्रा महत्वाकांक्षा की मिसाल है—सहकारी बोर्ड से डिप्टी सीएम तक, और अंत में ‘बादशाह’ तक।
