ग्रीनलैंड के बर्फ के नीचे छिपा अमेरिका का खतरनाक राज: 600 परमाणु मिसाइलों वाला गुप्त ‘आइसवर्म’ प्लान
ग्रीनलैंड के बर्फ के नीचे छिपा अमेरिका का खतरनाक राज: 600 परमाणु मिसाइलों वाला गुप्त ‘आइसवर्म’ प्लान
कोल्ड वॉर के दौर में अमेरिका ने दुनिया को चौंकाने वाला एक गुप्त सैन्य प्लान तैयार किया था, जिसका नाम था प्रोजेक्ट आइसवर्म। इस योजना के तहत ग्रीनलैंड की विशाल बर्फ की चादर के नीचे हजारों किलोमीटर लंबी सुरंगों का जाल बिछाकर 600 परमाणु मिसाइलें छिपाने और उन्हें सोवियत संघ पर हमले के लिए तैयार रखने का इरादा था।
1959 में अमेरिकी आर्मी ने कैंप सेंचुरी नाम की एक बेस बनाई, जिसे सार्वजनिक रूप से “परमाणु ऊर्जा से चलने वाला आर्कटिक रिसर्च सेंटर” बताया गया। लेकिन असल मकसद कुछ और था। यह बेस प्रोजेक्ट आइसवर्म का परीक्षण स्थल था, जहां बर्फ के नीचे रेल ट्रैक्स पर मिसाइलों को घुमाकर छिपाया जाता और जरूरत पड़ने पर लॉन्च किया जाता। प्लान था कि 4,000 किलोमीटर (लगभग 2,500 मील) लंबी सुरंगों में मिनुटमैन जैसी मिसाइलों के संशोधित वर्जन (“आइसमैन”) को 2,100 से ज्यादा साइलो में रखा जाए। इससे सोवियत संघ को कभी पता नहीं चल पाता कि मिसाइल कहां से लॉन्च होगी, और अमेरिका को दूसरी स्ट्राइक की क्षमता मिल जाती।
इस प्रोजेक्ट में करीब 11,000 सैनिकों को बर्फ के नीचे रहने की व्यवस्था करनी थी। कैंप में अस्पताल, थिएटर, चर्च और यहां तक कि छोटा न्यूक्लियर रिएक्टर भी था। लेकिन प्रकृति ने अमेरिका के इस ‘डर्टी सीक्रेट’ को नाकाम कर दिया। बर्फ की दीवारें लगातार सरक रही थीं, जिससे सुरंगें दबने लगीं और रेल ट्रैक्स काम करना बंद हो गए। 1967 तक कैंप को पूरी तरह छोड़ दिया गया। न्यूक्लियर रिएक्टर हटा लिया गया, लेकिन पीछे हजारों लीटर डीजल, वेस्टवॉटर, रेडियोएक्टिव कूलेंट और PCB जैसे जहरीले पदार्थ छोड़ दिए गए।
यह राज 1997 में डेनमार्क की संसदीय जांच के बाद सामने आया, क्योंकि ग्रीनलैंड उस समय डेनमार्क का हिस्सा था और अमेरिका ने डेनिश सरकार को इस मिसाइल प्लान के बारे में कभी नहीं बताया। आज जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघल रही है, और वैज्ञानिकों को डर है कि ये जहरीले कचरे समुद्र और पर्यावरण में फैल सकते हैं।
NASA की हालिया रडार इमेजिंग से कैंप सेंचुरी के अवशेष फिर से नजर आए हैं, जो याद दिलाते हैं कि कोल्ड वॉर के दौरान अमेरिका कितने गुप्त और जोखिम भरे कदम उठा रहा था। ग्रीनलैंड आज भी सामरिक महत्व रखता है, लेकिन उस दौर का यह “डर्टी सीक्रेट” अब पर्यावरणीय खतरे के रूप में उभर रहा है।
