‘गंगा स्नान तभी होगा जब…’, शिविर में हंगामे के बाद अविमुक्तेश्वरानंद का बयान
‘गंगा स्नान तभी होगा जब…’, शिविर में हंगामे के बाद अविमुक्तेश्वरानंद का बयान
प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिविर में हंगामा और विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। मौनी अमावस्या (18 जनवरी 2026) के दिन गंगा स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद अब और गहरा गया है। पुलिस-प्रशासन द्वारा पालकी से स्नान के लिए जाने पर रोक लगाने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने धरना शुरू किया, अन्न-जल त्याग दिया और अब शिविर में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
शनिवार (24 जनवरी 2026) देर शाम उनके शिविर पर कुछ लोगों ने लाठी-डंडों के साथ पहुंचकर योगी जिंदाबाद के नारे लगाए और हंगामा किया। इससे शिष्यों में आक्रोश फैला और सुरक्षा को और सख्त कर दिया गया है। शिविर के चारों ओर बैरिकेडिंग की गई है।
जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से पूछा गया कि अब गंगा स्नान कब करेंगे, तो उन्होंने साफ-साफ बयान दिया:
“ससम्मान हमको जिन लोगों ने रोका है, वो स्नान कराने के लिए ले जाएंगे, तभी जाएंगे।”
उन्होंने कहा कि जब तक प्रशासन और पुलिस सम्मानपूर्वक प्रोटोकॉल के साथ उन्हें गंगा स्नान के लिए नहीं ले जाएंगे, तब तक वे स्नान नहीं करेंगे। उन्होंने इसे अपनी गरिमा और शंकराचार्य पद की प्रतिष्ठा से जोड़ा है।
विवाद का पूरा बैकग्राउंड:
मौनी अमावस्या पर स्वामी पालकी से संगम स्नान के लिए जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने रोक दिया (VIP स्नान प्रतिबंधित होने का दावा)।
इससे नाराज होकर वे बिना स्नान किए लौट आए और धरना शुरू कर दिया।
मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी किया, शंकराचार्य पद के इस्तेमाल पर सवाल उठाए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे “सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश” बताया, जबकि कुछ मंत्री (जैसे ओमप्रकाश राजभर) ने कहा कि “गंगा स्नान कर घर जाएं”।
अन्य संतों (जैसे रामभद्राचार्य) ने भी पालकी से स्नान पर एतराज जताया।
यह पूरा मामला अब राजनीतिक रंग ले चुका है, जिसमें सपा-कांग्रेस के समर्थक भी सड़कों पर हंगामा कर रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा है कि वे आर-पार के मूड में हैं और अगले साल फिर आएंगे, लेकिन तब तक ससम्मान गंगा स्नान होना चाहिए।
प्रशासन का कहना है कि कोई नियम तोड़ने पर रोक लगाई गई, लेकिन स्वामी इसे अपमान बता रहे हैं। माघ मेले में यह विवाद अब बड़े स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
क्या यह विवाद सुलझेगा या और बढ़ेगा? सनातन परंपरा और प्रशासन के बीच टकराव जारी है!
