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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के ‘शंकराचार्य’ पद पर कानूनी संकट! माघ मेला प्रशासन ने जारी किया नोटिस, सुप्रीम कोर्ट आदेश का हवाला

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के ‘शंकराचार्य’ पद पर कानूनी संकट! माघ मेला प्रशासन ने जारी किया नोटिस, सुप्रीम कोर्ट आदेश का हवाला

प्रयागराज: प्रयागराज में चल रहे माघ मेला 2026 में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ज्योतिर्मठ (ज्योतिष पीठ) के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ‘शंकराचार्य’ पद की वैधता पर सवाल उठते हुए मेला प्रशासन ने उन्हें नोटिस जारी किया है। नोटिस में पूछा गया है कि वे खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य कैसे बता रहे हैं, जबकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।

क्या है पूरा मामला?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को 2022 में स्वर्गीय स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उनके शिष्य के रूप में ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य घोषित किया गया था।

लेकिन इस नियुक्ति पर विवाद है। सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपील (केस: 3010/2020, जगत गुरु शंकराचार्य ज्योतिषपीठ बनाम स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती) लंबित है।

अक्टूबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश दिया था कि अपील के निस्तारण तक कोई भी व्यक्ति ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य बनकर पट्टाभिषेक नहीं कर सकता।

मेला प्रशासन का कहना है कि इस आदेश के बावजूद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेले में अपने शिविर के बोर्ड पर खुद को “ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य” लिखवाया है, जो कोर्ट आदेश की अवहेलना है।

नोटिस में 24 घंटे के अंदर जवाब मांगा गया है। नोटिस उपाध्यक्ष दयानंद प्रसाद ने जारी किया।

मेला में क्या हुआ?

मौनी अमावस्या (19 जनवरी 2026) पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी (पालकी) और 200-300 शिष्यों के साथ संगम स्नान के लिए जा रहे थे।

भीड़ और सुरक्षा कारणों से पुलिस ने पालकी रोक दी। प्रशासन ने पैदल स्नान का विकल्प दिया, लेकिन स्वामी जी नहीं माने।

विवाद बढ़ा, शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई। स्वामी जी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने शिष्यों को पीटा, 35 को हिरासत में लिया।

इसके विरोध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अनशन पर बैठ गए। वे 28 घंटे से अधिक समय से अन्न-जल त्याग चुके हैं और धरने पर हैं।

प्रशासन ने आरोपों को खारिज किया, कहा कि कोई अपमान नहीं हुआ, बल्कि भीड़ के कारण रोक लगाई गई।

राजनीतिक रंग:

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने फोन कर समर्थन जताया, कहा- “साधु-संतों का अपमान अक्षम्य”।

स्वामी जी ने कहा कि वे हाईकोर्ट जाएंगे, जरूरत पड़ी तो FIR दर्ज कराएंगे।

अखाड़ा परिषद और कुछ संतों ने पहले से ही उनकी नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी, कहा था कि परंपरा के अनुसार नहीं हुई।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष:

उनके मीडिया प्रभारी शैलेंद्र योगीराज ने कहा कि पट्टाभिषेक सुप्रीम कोर्ट आदेश से पहले हो चुका था।

स्वामी जी ने दावा किया कि वे शंकराचार्य हैं और रहेंगे, दो अन्य शंकराचार्यों का समर्थन है।

यह विवाद ज्योतिष पीठ की वैधता, धार्मिक परंपरा और प्रशासनिक नियमों के बीच टकराव को दिखाता है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक यह संकट बना रह सकता है। माघ मेले में धार्मिक उत्साह के बीच यह घटना राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ रही है।

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