‘मोदी सरकार कब तक सच्चाइयों से इनकार करती रहेगी?’: कांग्रेस ने विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘A Breath of Change’ पर केंद्र पर साधा निशाना
‘मोदी सरकार कब तक सच्चाइयों से इनकार करती रहेगी?’: कांग्रेस ने विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘A Breath of Change’ पर केंद्र पर साधा निशाना
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट ‘A Breath of Change: Solutions for Cleaner Air in the Indo-Gangetic Plains and Himalayan Foothills’ का हवाला देते हुए मोदी सरकार पर वायु प्रदूषण के संकट को नजरअंदाज करने का गंभीर आरोप लगाया है। रिपोर्ट दिसंबर 2025 में जारी हुई थी, जिसमें इंडो-गंगा मैदानों और हिमालयी तलहटी क्षेत्रों (IGP-HF) में वायु प्रदूषण को दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य और विकास चुनौतियों में से एक बताया गया है।
रिपोर्ट के प्रमुख आंकड़े
इस क्षेत्र में लगभग 1 अरब लोग प्रतिदिन खतरनाक वायु का सामना कर रहे हैं।
हर साल लगभग 10 लाख समयपूर्व मौतें (premature deaths) हो रही हैं।
औसत जीवन प्रत्याशा 3 वर्ष से अधिक कम हो रही है।
आर्थिक नुकसान: क्षेत्रीय GDP का करीब 10% प्रतिवर्ष खो रहा है, जिसमें उत्पादकता में कमी, बीमारी और संबंधित क्षति शामिल हैं।
रिपोर्ट का लक्ष्य: 2035 तक औसत वार्षिक PM2.5 स्तर को 35 µg/m³ से नीचे लाना (’35 by 35′ लक्ष्य), जो वर्तमान स्तर से आधे से अधिक कमी होगी।
रिपोर्ट में प्रदूषण के मुख्य स्रोत बताए गए हैं: घरों में ठोस ईंधन जलाना, उद्योगों में जीवाश्म ईंधन और बायोमास का अक्षम उपयोग, पुराने वाहन, फसल अवशेष जलाना और कचरा जलाना।
रिपोर्ट के सुझाव
विश्व बैंक ने व्यावहारिक रोडमैप दिया है, जिसमें शामिल हैं:
कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के उत्सर्जन मानकों का सख्त पालन और सबसे पुराने प्लांट्स को तेजी से बंद करना।
शहर-केंद्रित योजनाओं से हटकर एयरशेड-आधारित शासन (airshed-based governance) की ओर बढ़ना, जो सभी राज्यों में लागू हो।
सार्वजनिक परिवहन का विस्तार और विद्युतीकरण, वाहनों के उत्सर्जन एवं ईंधन मानकों को और सख्त करना।
क्षेत्रीय सहयोग, मजबूत नीतियां और निरंतर निवेश से प्रदूषण में बड़ी कमी संभव।
कांग्रेस का रुख और सुझाव
जयराम रमेश ने X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट में कहा कि रिपोर्ट “व्यापक, साक्ष्य-आधारित और बिल्कुल स्पष्ट” है। कांग्रेस ने हाल के वर्षों में गहराते AQI संकट को देखते हुए लगातार ये सुझाव दिए हैं:
वायु प्रदूषण (नियंत्रण और निवारण) अधिनियम, 1981 और NAAQS, 2009 की समीक्षा, खासकर PM2.5 पर फोकस।
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का वित्तीय आवंटन और भौगोलिक कवरेज बड़े पैमाने पर बढ़ाना, प्रदर्शन मापदंड के रूप में PM2.5 स्तर अपनाना।
वायु प्रदूषण मानकों और नियमों का बिना किसी ढील या कमजोरी के सख्त पालन सुनिश्चित करना।
रमेश ने सवाल उठाया: “मोदी सरकार कब तक सच्चाइयों से इनकार करती रहेगी?” उन्होंने कहा कि रिपोर्ट समयानुकूल है और केंद्र को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, वरना स्वास्थ्य और आर्थिक नुकसान और बढ़ेगा।
रिपोर्ट का संदर्भ
विश्व बैंक की यह रिपोर्ट दक्षिण एशिया (भारत, बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, भूटान) के IGP-HF क्षेत्र पर फोकस करती है, जहां PM2.5 स्तर WHO मानकों से 20 गुना अधिक हैं। रिपोर्ट ‘Striving for Clean Air (2023)’ पर आधारित है और क्षेत्रीय सहयोग पर जोर देती है।
यह मुद्दा दिल्ली-NCR और उत्तर भारत में बढ़ते स्मॉग और स्वास्थ्य संकट के बीच और प्रासंगिक हो गया है। क्या केंद्र सरकार अब रिपोर्ट के सुझावों पर अमल करेगी? कमेंट में अपनी राय बताएं।
