कश्मीर से दिल्ली तक खतरे का संकेत: बर्फ-रहित हिमालय ने बिगाड़ी तस्वीर, बढ़ते तापमान से गहराया संकट
कश्मीर से दिल्ली तक खतरे का संकेत: बर्फ-रहित हिमालय ने बिगाड़ी तस्वीर, बढ़ते तापमान से गहराया संकट
हिमालय की चोटियां इस सर्दी में बर्फ से रहित (snowless) नजर आ रही हैं, जो कश्मीर से लेकर दिल्ली तक के लिए एक बड़ा खतरे का संकेत है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 की शुरुआत में बर्फबारी लगभग न के बराबर रही है। वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई अस्थायी मौसमी गड़बड़ी नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण बढ़ते तापमान और कमजोर पश्चिमी विक्षोभ (western disturbances) का नतीजा है। इससे पानी की कमी, कृषि, पर्यटन और पर्यावरण पर गहरा असर पड़ रहा है, जो अंततः दिल्ली सहित उत्तर भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंचेगा।
हिमालय में बर्फ की भारी कमी क्यों?
हिमालय में तापमान वैश्विक औसत से तेजी से बढ़ रहा है, जिससे सर्दियों की बर्फबारी 25% तक घट चुकी है (1980-2020 के औसत की तुलना में पिछले 5 वर्षों में)। पश्चिमी विक्षोभ, जो भूमध्य सागर से आते हैं और बर्फबारी लाते हैं, अब कमजोर और उत्तर की ओर खिसक रहे हैं। नतीजा: रूस-चीन में रिकॉर्ड बर्फबारी, लेकिन हिमालय सूना। ICIMOD की रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 सर्दी में हिमालय में बर्फ की अवधि (snow persistence) 23 वर्षों में सबसे कम रही, जो 24% नीचे सामान्य स्तर से थी। जनवरी 2026 में उत्तराखंड के कई स्टेशनों पर बर्फ जमा नहीं हुई, जो 1985 से अब तक नहीं देखा गया।
यह ‘स्नो ड्राउट’ (snow drought) कई वर्षों से जारी है, और विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन से जुड़ा मानते हैं। हिमालय ग्लोबल वार्मिंग का हॉटस्पॉट बन चुका है, जहां बर्फ की जगह बारिश बढ़ रही है, लेकिन बर्फ कम हो रही है।
कश्मीर से दिल्ली तक क्या खतरा?
पानी की कमी: हिमालय ‘एशिया का वाटर टावर’ है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां बर्फ पिघलने से पानी पाती हैं। कम बर्फ से वसंत में कम पानी, गर्मियों में सूखा। दिल्ली और उत्तर भारत की नदियां प्रभावित होंगी, सिंचाई और पीने के पानी पर असर।
कृषि और फसलें: कश्मीर में सेब, केसर जैसी फसलों को ठंड और बर्फ चाहिए। सूखी सर्दी से फसल प्रभावित, उत्पादन घटेगा। हिमाचल-उत्तराखंड में भी खेती संकट में।
पर्यटन संकट: गुलमर्ग, मनाली, औली जैसे स्थानों पर बर्फ न होने से पर्यटक रद्द कर रहे हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था ठप।
पर्यावरणीय खतरे: जंगल सूखे, आग का खतरा बढ़ा (जैसे कश्मीर के जबरवान हिल्स में आग)। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, GLOF (glacial lake outburst floods), भूस्खलन और हिमस्खलन का जोखिम बढ़ेगा।
मैदानी इलाकों पर असर: कम बर्फ से ठंड कम, लेकिन कोहरा और प्रदूषण बढ़ा। लंबे समय में पानी संकट से दिल्ली-NCR प्रभावित होगा।
विशेषज्ञों की चेतावनी
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय अब ‘डबल ट्रबल’ में है – ग्लेशियर पिघल रहे हैं और बर्फ कम हो रही है। IPCC और अन्य अध्ययनों से पता चलता है कि अगर तापमान बढ़ता रहा, तो 2100 तक ग्लेशियर 30-50% तक कम हो सकते हैं। यह 2 अरब लोगों के लिए पानी संकट ला सकता है।
यह समय कार्बन उत्सर्जन कम करने, जल संरक्षण और अनुकूलन रणनीतियों का है। हिमालय की बर्फ गायब होना सिर्फ पहाड़ों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत का संकट है। क्या हम अभी जागेंगे? पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अब देर नहीं हुई, लेकिन कार्रवाई जरूरी है।
