मोदी सरकार की ‘नेम चेंज’ क्रांति: PMO से ‘सेवा तीर्थ’ तक, यहां है पूरी ‘करेक्टेड लिस्ट’!
नई दिल्ली, 14 जनवरी 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में नाम बदलने की नीति अब एक प्रमुख पहचान बन चुकी है। ब्रिटिश काल के ‘राजपथ’ को ‘कर्तव्य पथ’ बनाने से लेकर योजना आयोग को ‘नीति आयोग’ में तब्दील करने तक, और हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) परिसर को ‘सेवा तीर्थ’ नाम देने तक—यह सब ‘सत्ता से सेवा’ और ‘कॉलोनियल लिगेसी से मुक्ति’ की दिशा में कदम माने जा रहे हैं। सरकार का कहना है कि ये बदलाव जन-केंद्रित शासन, कर्तव्यबोध और सेवा भावना को मजबूत करते हैं। यहां है मोदी सरकार की प्रमुख नेम चेंज की ‘करेक्टेड लिस्ट’:
प्रमुख संस्थानों/परिसरों के नाम बदलाव
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) परिसर → सेवा तीर्थ (2025-26)
नया कॉम्प्लेक्स (Central Vista प्रोजेक्ट के तहत) अब ‘सेवा तीर्थ’ कहलाएगा। यह ‘सेवा’ और ‘तीर्थ’ (पवित्र स्थान) से प्रेरित है, जो सेवा को तीर्थ जैसा पवित्र मानता है। साथ ही राज भवन → लोक भवन और राज निवास → लोक निवास हो रहे हैं। केंद्रीय सचिवालय → कर्तव्य भवन।
योजना आयोग → नीति आयोग (2015)
टॉप-डाउन मॉडल से कोऑपरेटिव फेडरलिज्म और बॉटम-अप अप्रोच की ओर शिफ्ट।
राजपथ (और सेंट्रल विस्टा लॉन्स) → कर्तव्य पथ (2022)
ब्रिटिश काल में ‘किंग्सवे’ था, आजादी के बाद ‘राजपथ’। अब ‘कर्तव्य पथ’—राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक का पूरा रास्ता।
दिल्ली की प्रमुख सड़कों के नाम बदलाव
औरंगजेब रोड → डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम रोड (2015)
मुगल बादशाह के नाम से वैज्ञानिक राष्ट्रपति के नाम पर।
डलहौजी रोड (ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के नाम पर) → दारा शिकोह रोड (2017)
मुगल राजकुमार दारा शिकोह (शाहजहां के बड़े बेटे) के नाम पर, जो सहिष्णुता और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं।
रेस कोर्स रोड (पीएम आवास वाली सड़क) → लोक कल्याण मार्ग (2016)
‘रेस कोर्स’ से ‘लोक कल्याण’—जनता के कल्याण पर फोकस।
टीन मूर्ति चौक → टीन मूर्ति हैफा चौक (2018)
इजरायल के साथ संबंध मजबूत करने का प्रतीक।
अन्य प्रमुख बदलाव (योजनाएं और संस्थान)
कई योजनाओं के नाम भी बदले गए, जैसे जन औषधि योजना को प्रधानमंत्री जन औषधि योजना में शामिल किया गया।
हाल के वर्षों में ‘सत्ता से सेवा’ की थीम पर फोकस: नामों में ‘लोक’, ‘कर्तव्य’, ‘सेवा’ जैसे शब्द प्रमुख हो रहे हैं।
सरकार का तर्क और विपक्ष की आलोचना
सरकार का कहना है कि ये बदलाव औपनिवेशिक और ‘सत्ता-केंद्रित’ नामों से मुक्ति दिलाते हैं, और ‘सेवा’, ‘कर्तव्य’ और ‘लोक’ जैसे मूल्यों को बढ़ावा देते हैं। अमित शाह ने इसे ‘विकसित भारत’ की ओर महत्वपूर्ण कदम बताया।
विपक्ष (कांग्रेस आदि) इसे ‘प्राथमिकताओं का उलटा’ बताता है—नाम बदलने से ज्यादा विकास और रोजगार पर फोकस होना चाहिए। कुछ इसे ‘पॉलिटिकल सिंबॉलिज्म’ कहते हैं।
यह लिस्ट लगातार बढ़ रही है—2025-26 में ‘सेवा तीर्थ’ सबसे नया और चर्चित बदलाव है। क्या आपको लगता है कि नाम बदलाव से वाकई बदलाव आता है? कमेंट में बताएं। ✨
