मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की मांग की जड़ें और ठाकरे बंधुओं की राजनीतिक रणनीति
मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की मांग की जड़ें इतिहास में गहरी हैं, लेकिन हाल के वर्षों में यह राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरा है, खासकर महाराष्ट्र की सियासत में। आइए स्टेप बाय स्टेप समझते हैं कि यह बात कहां से निकली और ठाकरे बंधु (उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे) के लिए यह कितना कारगर साबित हो रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1950-60 के दशक से शुरू
भारत की आजादी के बाद 1950 के दशक में राज्य पुनर्गठन के दौरान बॉम्बे (अब मुंबई) को लेकर विवाद हुआ था। केंद्र सरकार की योजना थी कि मुंबई को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश (यूनियन टेरिटरी) बनाया जाए, क्योंकि यह बहुभाषी शहर था और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण था। इसमें गुजराती, मराठी और अन्य समुदायों के हित जुड़े थे।
लेकिन मराठी भाषी लोगों ने इसका विरोध किया। ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ (Samyukta Maharashtra Movement) चला, जिसमें मराठी नेता जैसे एस.एम. जोशी, प्रबोधनकार ठाकरे (बाल ठाकरे के पिता) और अन्य शामिल थे। इस आंदोलन में 100 से ज्यादा लोगों की जान गई, और आखिरकार 1 मई 1960 को मुंबई सहित महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ।
यह मांग मूल रूप से केंद्र की नीतियों से निकली थी, जो मुंबई को अलग रखकर उसकी आर्थिक शक्ति को नियंत्रित करना चाहती थी।
हालिया उभार: राजनीतिक साजिश का आरोप
पिछले कुछ वर्षों में यह मुद्दा फिर से जीवंत हुआ है, मुख्य रूप से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से। दिसंबर 2024 में कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने मुंबई को यूनियन टेरिटरी बनाने की मांग उठाई, जिसका उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने कड़ा विरोध किया।
2025 में राज ठाकरे ने दावा किया कि केंद्र (बीजेपी) मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश रच रहा है। उन्होंने तीन-भाषा नीति (हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषा) को इसका ‘पूर्व संकेत’ बताया, और कहा कि हिंदी थोपने की कोशिश से मराठी अस्मिता खतरे में है।
उद्धव ठाकरे ने भी 2024 में कहा था कि बीजेपी मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MMRDA) के जरिए बीएमसी (मुंबई नगर निगम) की शक्तियां कम करके मुंबई को अलग करने की कोशिश कर रही है।
हाल ही में (जनवरी 2026) ठाकरे भाइयों ने बीजेपी और अदाणी को निशाना बनाते हुए कहा कि वे मुंबई को ‘छीन’ लेना चाहते हैं, और इसे ‘उत्तर भारतीय साजिश’ बताया। यह BMC चुनावों से पहले मराठी मतदाताओं को एकजुट करने की रणनीति लगती है।
ठाकरे बंधुओं के लिए कितना कारगर है यह मुद्दा?
हां, यह मुद्दा ठाकरे भाइयों के लिए काफी कारगर साबित हो रहा है। 2025 में उद्धव (शिवसेना UBT) और राज (MNS) ने 20 साल बाद हाथ मिलाया, और मराठी मानुष (मराठी अस्मिता) को केंद्र में रखकर रैलियां कीं।
मुंबई में मराठी आबादी घट रही है (जनसांख्यिकीय बदलाव), और उत्तर भारतीय/गैर-मराठी वोटर बढ़ रहे हैं। ठाकरे इसे ‘मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश’ बताकर मराठी वोट बैंक को मजबूत कर रहे हैं, खासकर BMC चुनावों में जहां शिवसेना का दबदबा रहा है।
यह मुद्दा उनके पारिवारिक विरासत (बाल ठाकरे की मराठी अस्मिता) से जुड़ा है, जो उन्हें बीजेपी (महायुति) के खिलाफ मजबूत बनाता है। हालांकि, कुछ आलोचक इसे पुरानी राजनीति बताते हैं, लेकिन चुनावी रणनीति के रूप में यह काम कर रहा है।
कुल मिलाकर, यह मांग केंद्र की पुरानी नीतियों से निकली, लेकिन अब सियासी हथियार बन गई है। ठाकरे भाई इसे भुनाकर मराठी गौरव को बढ़ावा दे रहे हैं।
