Friday, June 26, 2026
उत्तराखंड

चंपावत बाईपास: 1882 पेड़ों की बलि पर 9.87 किमी सड़क, विकास vs पर्यावरण की नई जंग!

चंपावत बाईपास: 1882 पेड़ों की बलि पर 9.87 किमी सड़क, विकास vs पर्यावरण की नई जंग!

चंपावत। उत्तराखंड के चंपावत जिले में यातायात की बढ़ती समस्या से निजात दिलाने के लिए मुड़ियानी से तिलौन तक 9.87 किलोमीटर लंबे बाईपास का निर्माण होने जा रहा है। करीब 220 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए 1882 पेड़ों की कटाई की अनुमति मिल चुकी है, जिससे पर्यावरण और विकास के बीच एक बार फिर बहस छिड़ गई है। एनएच खंड ने टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी है, और जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद है।

प्रोजेक्ट की मुख्य डिटेल्स:

लंबाई: 9.87 किमी (करीब 10 किमी)।

रूट: टनकपुर रोड पर मुड़ियानी के पास से शुरू होकर चैकुनीबोरा, चैकुनी पांडेय, कफलांग, शक्तिपुरबुंगा, दुधपोखरा, नगरगांव होते हुए तिलौन तक।

लागत: 220.88 करोड़ रुपये।

संरचना: 7 पुल, 69 कलवर्ट; 24 मीटर चौड़ी जमीन अधिग्रहण, जिसमें 12 मीटर सड़क। कुल 8.94 हेक्टेयर वन भूमि और 12.78 हेक्टेयर निजी भूमि प्रभावित।

उद्देश्य: चंपावत शहर में बढ़ते ट्रैफिक जाम से राहत, खासकर चीन सीमा तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर। चार धाम यात्रा और सीमांत क्षेत्र के परिवहन को सुगम बनाना।

यह बाईपास टनकपुर-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग का हिस्सा है, जहां तीन बाईपास (चंपावत, लोहाघाट, पिथौरागढ़) प्रस्तावित हैं। अन्य हिस्सों में 126 किमी सड़क पहले ही पूरी हो चुकी है।

पर्यावरण पर सवाल:

1882 पेड़ों की कटाई से पर्यावरण प्रेमी चिंतित हैं। हिमालयी क्षेत्र में पहले से ही भूस्खलन और जलवायु परिवर्तन का खतरा है। अरावली के बाद अब चंपावत में पेड़ कटाई को लेकर बहस गर्म है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर वृक्षों का नुकसान ऑक्सीजन स्तर, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता को प्रभावित करेगा। हालांकि, प्रशासन का दावा है कि क्षतिपूर्ति में दोगुने पेड़ लगाए जाएंगे।

विकास का पक्ष:

स्थानीय लोग और व्यापारी इसे जरूरी बता रहे हैं। शहर में रोजाना जाम से घंटों फंसना पड़ता है। बाईपास से यात्रा समय कम होगा, व्यापार बढ़ेगा और दुर्घटनाएं घटेंगी।

प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए वैकल्पिक उपायों पर ध्यान देने की मांग उठ रही है। चंपावत के लिए यह विकास की नई शुरुआत है, लेकिन प्रकृति की कीमत पर? देखना यह होगा कि प्रशासन कैसे बैलेंस बनाता है।

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