Monday, September 14, 2026
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वैदिक विवाह क्या है? सरल भाषा में पूरी जानकारी

वैदिक विवाह क्या है? सरल भाषा में पूरी जानकारी

वैदिक विवाह हिन्दू धर्म का सबसे शुद्ध और प्राचीन विवाह है, जो वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) में वर्णित विधि-विधान से होता है। इसे “सनातन संस्कारों का सर्वोत्तम संस्कार” माना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए जीवनसाथी बनाना है।

वैदिक विवाह के 8 प्रकार (अष्टविवाह)

वेदों में विवाह के 8 रूप बताए गए हैं:

ब्राह्म – कुंडली मिलाकर, पूरे विधि-विधान से (सबसे श्रेष्ठ)

दैव – यज्ञ में कन्या को दान

आर्ष – ऋषि को गाय-बैल देकर कन्या लेना

प्रजापत्य – बिना दहेज-दान के साधारण विवाह

गंधर्व – प्रेम विवाह (बिना मंत्र-वेदी के)

असुर – पैसे देकर कन्या खरीदना

राक्षस – बलपूर्वक हरण करके विवाह

पैशाच – नशीली हालत में या छल से विवाह (सबसे निंदनीय)

आजकल 99% हिन्दू विवाह “ब्राह्म विवाह” ही होते हैं।

वैदिक विवाह की मुख्य रीतियाँ और उनका अर्थ

कन्यादान

पिता कन्या को वर के हाथ में सौंपता है और कहता है –

“मैं इस कन्या को धर्म, अर्थ, काम की सिद्धि के लिए तुम्हें देता हूँ।”

यह सबसे पवित्र क्षण होता है।

पाणिग्रहण

वर कन्या का दाहिना हाथ पकड़कर 7 मंत्र बोलता है। इनमें सबसे प्रसिद्ध है:

“धृतं ते हस्तं… मैं तेरे हृदय से हृदय, मन से मन, प्राण से प्राण जुड़ूं।”

सप्तपदी (सात फेरे)

सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा। अग्नि को साक्षी मानकर दंपति 7 वचन लेते हैं:

पहला फेरा – भोजन की व्यवस्था

दूसरा – शारीरिक-मानसिक बल

तीसरा – धर्म पालन

चौथा – सुख-संपत्ति

पांचवां – पशु-पक्षियों की रक्षा

छठा – सभी ऋतु में साथ निभाना

सातवां – आजीवन एक-दूसरे के प्रति निष्ठा

सातवें फेरे के बाद ही विवाह पूर्ण माना जाता है।

लाजाहोम

कन्या भुने हुए लावा (खील) अग्नि में डालती है, भाई खील देते हैं – यह भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है।

सिंदूरदान और मंगलसूत्र

वर कन्या की मांग में सिंदूर भरता है और गले में मंगलसूत्र बांधता है – सुहाग की निशानी।

हृदय स्पर्श और अक्षत

एक-दूसरे के हृदय को छूकर अक्षत (चावल) फेंकते हैं – शुभकामना का प्रतीक।

वैदिक विवाह क्यों खास है?

इसमें अग्नि, वेदमंत्र, सूर्य, ब्रह्मा आदि साक्षी होते हैं।

यह केवल शारीरिक नहीं, आत्मिक मिलन है।

पति-पत्नी को “सहधर्मिणी” और “अर्धांगिनी” कहा जाता है – यानी धर्म की आधी भागीदार।

आज भी ज्यादातर पंडित जी वैदिक मंत्रों से ही विवाह करवाते हैं। अगर आप सचमुच सनातनी तरीके से शादी करना चाहते हैं, तो सप्तपदी और कन्यादान को कभी कम न होने दें – यही वैदिक विवाह का सार है।

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