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संचार साधी के बाद नई गोपनीयता जंग: फोन लोकेशन हमेशा ऑन रखने का प्रस्ताव, ऐपल-गूगल ने ठोक दिया विरोध

संचार साधी के बाद नई गोपनीयता जंग: फोन लोकेशन हमेशा ऑन रखने का प्रस्ताव, ऐपल-गूगल ने ठोक दिया विरोध

संचार साधी ऐप के विवाद के बाद केंद्र सरकार अब एक और विवादास्पद कदम की ओर बढ़ रही है—स्मार्टफोन्स में सैटेलाइट-आधारित लोकेशन ट्रैकिंग (A-GPS) को हमेशा सक्रिय रखने का प्रस्ताव। यह कदम कानून प्रवर्तन एजेंसियों को उपयोगकर्ताओं की सटीक लोकेशन उपलब्ध कराने के लिए है, लेकिन ऐपल, गूगल और सैमसंग जैसी दिग्गज कंपनियां इसे गोपनीयता का घोर उल्लंघन बता रही हैं। दस्तावेजों, ईमेलों और पांच सूत्रों के हवाले से रॉयटर्स ने गुरुवार को यह खुलासा किया।

सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI), जो रिलायंस जियो और भारती एयरटेल का प्रतिनिधित्व करती है, ने जून में आईटी मंत्रालय को ईमेल भेजकर यह सुझाव दिया। वर्तमान में, टेलीकॉम कंपनियां सेलुलर टावर डेटा से केवल अनुमानित लोकेशन दे पाती हैं, जो कई मीटर गलत हो सकती है। COAI का कहना है कि A-GPS—जो सैटेलाइट सिग्नल और सेल्युलर डेटा का मिश्रण इस्तेमाल करता है—से सटीक लोकेशन मिलेगी, लेकिन इसके लिए स्मार्टफोन निर्माताओं को लोकेशन सर्विसेज को हमेशा चालू रखने का आदेश देना पड़ेगा, बिना यूजर्स के इसे बंद करने के विकल्प के।

यह प्रस्ताव संचार साधी ऐप के आदेश की याद दिलाता है, जिसे 28 नवंबर को जारी किया गया था। उसमें सभी नए फोन्स में सरकारी साइबर सिक्योरिटी ऐप को प्री-इंस्टॉल करने और डिसेबल न करने का प्रावधान था, जिसके बाद ऐपल ने इसे ऐतिहासिक रूप से अस्वीकार किया। अब संचार साधी विवाद के ठीक बाद यह नया प्रस्ताव आया है, जो 1.2 अरब टेलीकॉम यूजर्स वाले भारत में गोपनीयता बहस को हवा दे रहा है।

ऐपल, गूगल और सैमसंग ने दिल्ली को स्पष्ट संदेश दिया है कि ऐसा कोई आदेश न दिया जाए। इन कंपनियों का तर्क है कि इससे फोन ‘समर्पित निगरानी उपकरण’ बन जाएंगे, जो कानूनी, सुरक्षा और गोपनीयता जोखिम पैदा करेगा। इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (ICEA)—जो ऐपल और गूगल का प्रतिनिधित्व करती है—ने जुलाई में एक गोपनीय पत्र में चेतावनी दी कि दुनिया में ऐसा कोई प्रीकेडेंट नहीं है। पत्र में कहा गया कि इनकी यूजर बेस में सैन्यकर्मी, जज, कॉर्पोरेट एक्जीक्यूटिव और पत्रकार शामिल हैं, जिनकी संवेदनशील जानकारी के कारण ट्रैकिंग जोखिम भरी होगी।

काउंटरपॉइंट रिसर्च के रिसर्च डायरेक्टर तरुण पाठक ने कहा, “ऐपल ऐसी सरकारी मांगों को हमेशा चुनौती देती रही है।” यूएस-बेस्ड इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन के सिक्योरिटी रिसर्चर कूपर क्विंटिन ने इसे “डरावना” बताया, जो दुनिया में कहीं नहीं देखा गया। भारत में 73.5 करोड़ स्मार्टफोन हैं, जिनमें 95% से ज्यादा एंड्रॉयड पर चलते हैं, जबकि बाकी iOS।

आईटी और गृह मंत्रालय इस प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे हैं, लेकिन टिप्पणी करने से इनकार किया। COAI और ICEA ने भी जवाब नहीं दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम रूस जैसे देशों की तर्ज पर हो सकता है, जहां स्टेट-बैक्ड ऐप अनिवार्य हैं। लेकिन गोपनीयता अधिवक्ताओं का कहना है कि इससे यूजर्स की आजादी खतरे में पड़ जाएगी। क्या सरकार पीछे हटेगी, या नई बहस छिड़ेगी? आने वाले दिन बताएंगे।

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