धर्म

पीरियड्स में पूजा: महिलाओं की शुद्धता पर सनातन धर्म की भ्रांतियां, प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट मत

पीरियड्स में पूजा: महिलाओं की शुद्धता पर सनातन धर्म की भ्रांतियां, प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट मत

सनातन धर्म में मासिक धर्म (पीरियड्स) को लेकर लंबे समय से चली आ रही परंपराएं आज भी महिलाओं को पूजा-पाठ से दूर रखने का कारण बनती हैं। क्या पीरियड्स में महिलाओं को पूजा करनी चाहिए? यह सवाल न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। वृंदावन के प्रसिद्ध संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज ने अपने सत्संगों में इस मुद्दे पर खुलकर बात की है, जो महिलाओं को सशक्त बनाने वाली है।

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, मासिक धर्म कोई अभिशाप या अशुद्धि नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है, जो महिलाओं के शरीर में स्वाभाविक रूप से होती है। उन्होंने हिंदू शास्त्रों का हवाला देते हुए समझाया कि जब देवराज इंद्र ने ब्रह्महत्या का पाप किया, तो ऋषियों ने इसे चार भागों में विभाजित कर दिया। इनमें से एक भाग महिलाओं ने स्वेच्छा से स्वीकार किया, जो मासिक धर्म के रूप में प्रकट होता है। यह कोई निंदनीय बात नहीं, बल्कि त्याग और कृपा का प्रतीक है। महाराज कहते हैं, “यह महिलाओं का सम्मान है, न कि शर्म का विषय। भगवान ने जो शरीर दिया, उसके चक्रों से कैसे दूरी बनाई जा सकती है?”

शास्त्रों में स्पष्ट है कि मासिक धर्म के पहले तीन दिनों में महिलाओं को पूजा-अनुष्ठान, मंत्र जाप (माला से), प्रसाद बनाना, रसोई में काम करना या ठाकुर जी की सेवा से परहेज करना चाहिए। यह नियम अशुद्धि के कारण नहीं, बल्कि आराम और ऊर्जा संरक्षण के लिए है। प्राचीन काल में सैनिटरी सुविधाओं की कमी के कारण महिलाओं को आराम दिया जाता था, ताकि वे स्वस्थ रहें। महाराज ने कहा, “शारीरिक कमजोरी के समय आराम करें, लेकिन भक्ति न छोड़ें। मन से ठाकुर जी का नाम जपें, भजन गाएं। पूजा न करें, लेकिन भगवान का चिंतन अवश्य करें।”

एक सत्संग में एक महिला भक्त ने पूछा, “तीर्थयात्रा के दौरान अगर पीरियड्स आ जाएं, तो दर्शन छोड़ दें?” महाराज ने सहजता से जवाब दिया, “दर्शन का सौभाग्य कभी न छोड़ें! गंगाजल से स्नान करें, साफ कपड़े पहनें, चंदन लगाएं और दूर से ही प्रभु के दर्शन करें। मूर्ति स्पर्श न करें, फूल-प्रसाद न चढ़ाएं। भक्ति से प्रार्थना करें।” यह उत्तर महिलाओं को भयमुक्त करता है, क्योंकि तीर्थस्थल तक पहुंचना कठिन होता है—समय, धन और श्रम लगता है। महाराज ने जोर दिया कि भगवान भक्ति देखते हैं, न कि शारीरिक अवस्था।

वैज्ञानिक रूप से भी पीरियड्स के दौरान हार्मोनल बदलाव से थकान, दर्द और भावनात्मक संवेदनशीलता बढ़ती है, इसलिए आराम जरूरी है। लेकिन यह महिलाओं को धार्मिक गतिविधियों से पूरी तरह वंचित नहीं करता। जया किशोरी जैसे अन्य वक्ताओं ने भी कहा कि यह आराम का समय है, न कि प्रतिबंध। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परंपराओं को संदर्भ के साथ समझना चाहिए, ताकि महिलाएं शर्मिंदगी महसूस न करें।

प्रेमानंद महाराज का संदेश सशक्तिकरण का है: “महिलाएं दैवीय शक्ति हैं। मासिक धर्म उनकी ताकत का प्रमाण है।” उनके वीडियो वायरल हो रहे हैं, जो लाखों महिलाओं को प्रेरित कर रहे। समाज को इन भ्रांतियों से ऊपर उठना होगा, ताकि भक्ति बिना भेदभाव के फले।

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