नए भूकंप मैप ने चौंकाया: हिमालय से दिल्ली-NCR तक खतरा दोगुना, जोन VI में सारा पहाड़ी इलाका
नए भूकंप मैप ने चौंकाया: हिमालय से दिल्ली-NCR तक खतरा दोगुना, जोन VI में सारा पहाड़ी इलाका
नई दिल्ली: भारत सरकार के ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) ने 2025 के संशोधित भूकंप डिजाइन कोड के तहत एक नया भूकंपीय जोनेशन मैप जारी किया है, जिसने पूरे देश को हिला दिया है। इस मैप के अनुसार, हिमालय का पूरा चाप—जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक—पहली बार नया बनाया गया सबसे ऊंचा खतरा जोन VI में डाल दिया गया है। इससे देश का 61% हिस्सा अब मध्यम से बहुत अधिक खतरे वाले जोन में आ गया है, जो पहले 59% था। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव पुरानी 2016 की मैप की कमियों को दूर करता है, जहां हिमालय को जोन IV और V में बांटा गया था, जबकि पूरी श्रृंखला एक ही टेक्टॉनिक तनाव का शिकार है।
यह नया मैप प्रोबेबिलिस्टिक सीस्मिक हेजर्ड असेसमेंट (PSHA) पर आधारित है, जो भविष्य के भूकंपों में पीक ग्राउंड एक्सेलरेशन (PGA) का अधिक सटीक अनुमान देता है। हिमालय क्षेत्र में भारतीय और यूरेशियन प्लेट्स के बीच सालाना 5 सेंटीमीटर की टक्कर से भारी तनाव जमा हो रहा है। वैज्ञानिकों ने लंबे समय से निष्क्रिय फॉल्ट लाइन्स—जैसे मेन फ्रंटल थ्रस्ट (MFT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) और मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT)—को ध्यान में रखा है, जो 200 वर्षों से बड़े भूकंप नहीं झेल चुके। इन ‘सीस्मिक गैप्स’ में ऊर्जा जमा हो रही है, जो कहीं भी विनाशकारी धक्का दे सकती है।
दिल्ली-NCR और देहरादून-ऋषिकेश जैसे इलाकों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। पुरानी मैप में दिल्ली जोन IV में थी, लेकिन अब हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट के दक्षिण की ओर फैलाव को मानते हुए, भूकंप की लहरें मोहंद (देहरादून के पास) तक पहुंच सकती हैं। इससे दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा मैदान वाले हिस्से उच्च जोखिम में आ गए हैं। देहरादून जैसे फुटहिल क्षेत्रों में रप्चर प्रोपगेशन का खतरा बढ़ा है, जहां भूकंप की तीव्रता 8.0 से ऊपर हो सकती है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, पूर्वोत्तर राज्यों के साथ गुजरात (कच्छ) और बिहार-नेपाल बॉर्डर भी अब ज्यादा खतरे में हैं।
BIS ने इंजीनियरों और प्लानर्स से अपील की है कि सभी नई इमारतें, पुल, अस्पताल और स्कूल इस 2025 मैप के मानकों पर बनें। नई गाइडलाइंस में लिक्विफेक्शन रिस्क, मिट्टी की लचक और साइट-स्पेसिफिक स्पेक्ट्रा को शामिल किया गया है। गैर-संरचनात्मक तत्व—जैसे छतें, टैंक, फेसेड और लटकते फिक्स्चर—को 1% से ज्यादा वजन होने पर मजबूती से एंकर करना जरूरी है। क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को भूकंप के बाद भी काम करने लायक बनाना होगा। दक्षिण भारत में मामूली बदलाव हैं, लेकिन इंट्रा-प्लेट भूकंपों को नजरअंदाज न करने की चेतावनी दी गई है।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के डायरेक्टर विनीत गहलौत ने कहा, “यह मैप हिमालयन बेल्ट को एकसमान खतरा दिखाता है, जो पहले प्रशासनिक सीमाओं पर आधारित था।” इतिहास गवाह है—1905 का कांगड़ा, 1934 का बिहार-नेपाल, 1950 का असम, 2005 का कश्मीर और 2015 का नेपाल भूकंप—ये सब हिमालय के खतरे की याद दिलाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मैप न केवल निर्माण को मजबूत करेगा, बल्कि शहरीकरण और आपदा प्रबंधन को नई दिशा देगा। दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (DDMA) ने चेतावनी दी है कि दिल्ली हिमालयन फॉल्ट्स के करीब होने से हमेशा जोखिम में रही है। अब प्रॉबेबिलिस्टिक एक्सपोजर एंड मल्टी-हेजर्ड असेसमेंट (PEMA) से मानवीय और आर्थिक नुकसान का अनुमान भी लगाया जा सकेगा। सरकार ने राज्यों से तुरंत इस मैप को अपनाने को कहा है, ताकि 75% आबादी वाले भूकंपीय क्षेत्र सुरक्षित हों। यह बदलाव भारत को भूकंप-प्रवण दुनिया में अधिक लचीला बनाएगा।
