गरीबी के बहाने पति को छोड़ने वाली पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
गरीबी के बहाने पति को छोड़ने वाली पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते (मेंटेनेंस) को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई पत्नी पति की गरीबी को कारण मानकर वैवाहिक घर छोड़ देती है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है। यह फैसला सीआरपीसी की धारा 125(4) के तहत आता है, जिसमें स्पष्ट है कि बिना पर्याप्त कारण के पति से अलग रहने वाली पत्नी को मेंटेनेंस नहीं मिल सकता। जस्टिस मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने चंदौली फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी की याचिका खारिज कर दी गई थी।
मामले का बैकग्राउंड: वित्तीय असंगति का दावा
यह केस चंदौली जिले का है, जहां पत्नी ने पति के खिलाफ मेंटेनेंस के लिए याचिका दायर की थी। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति क्रूरता करता है और उसे भरण-पोषण नहीं दे रहा। लेकिन क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान पत्नी ने स्वीकार किया कि उसका परिवार धनी है, जबकि पति गरीब पृष्ठभूमि से आता है। उसने कहा, “मैं खुशी-खुशी वैवाहिक घर छोड़कर मायके चली गई, क्योंकि रिश्ता असंगत था। पति के पास पढ़ाई के लिए भी पैसे नहीं थे।”
फैमिली कोर्ट ने 31 अक्टूबर 2023 को याचिका खारिज कर दी, क्योंकि पत्नी अलग रहने का पर्याप्त कारण साबित नहीं कर सकी। इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने अपनी पहचान और वैवाहिक स्थिति को लेकर कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की। पति ने बताया कि पंचायत में तलाक समझौता हो चुका था, और पत्नी ने दो साल बाद दूसरी शादी कर ली थी। हाईकोर्ट ने इसे ‘प्राइमा फेसी एडल्टरी’ माना।
पत्नी ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन (धारा 397/401 सीआरपीसी) दायर की, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। जस्टिस सिंह ने कहा, “ट्रायल कोर्ट का फैसला सही है। पत्नी ने क्रूरता के आरोप साबित नहीं किए, और वित्तीय असंगति ‘पर्याप्त कारण’ नहीं है।”
कोर्ट का तर्क: गरीबी पर्याप्त कारण नहीं
हाईकोर्ट ने जोर दिया कि मेंटेनेंस का अधिकार पत्नी को तब मिलता है, जब वह पति की क्रूरता, उपेक्षा या अन्य वैध कारणों से अलग रहने को मजबूर हो। लेकिन गरीबी या आर्थिक असंगति को ‘पर्याप्त कारण’ नहीं माना जा सकता। जस्टिस सिंह ने कहा, “धारा 125(4) स्पष्ट है: बिना पर्याप्त कारण के अलग रहने वाली पत्नी मेंटेनेंस की हकदार नहीं। यहां पत्नी ने स्वीकार किया कि वह अपनी मर्जी से गई, इसलिए कोई राहत नहीं।”
कोर्ट ने पत्नी के वकील की दलीलें—जैसे क्रूरता के आरोप—को खारिज कर दिया, क्योंकि कोई सबूत नहीं था। पति के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी ने कोर्ट को गुमराह किया, जो नैतिक रूप से गलत है।
कानूनी प्रावधान: सीआरपीसी धारा 125 का महत्व
सीआरपीसी की धारा 125 पत्नी, बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता को भरण-पोषण का अधिकार देती है। लेकिन उपधारा 4 में अपवाद हैं:
यदि पत्नी व्यभिचार में रह रही हो।
यदि बिना पर्याप्त कारण के पति से अलग रह रही हो।
यदि आपसी सहमति से अलग रह रहे हों।
यह फैसला इसी उपधारा पर आधारित है। हाईकोर्ट ने कहा कि मेंटेनेंस सामाजिक कल्याण के लिए है, लेकिन दुरुपयोग नहीं होने देना चाहिए।
पिछले फैसलों का संदर्भ
यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के पुराने निर्णयों से मेल खाता है:
जुलाई 2025 में जस्टिस सुबाष चंद्र शर्मा ने मेरठ फैमिली कोर्ट के फैसले को पलट दिया, जहां पत्नी बिना कारण अलग रह रही थी। कोर्ट ने कहा, “पर्याप्त कारण साबित न होने पर मेंटेनेंस नहीं।”
जून 2023 में जस्टिस प्रशांत कुमार ने मथुरा केस में कहा कि अपनी मर्जी से घर छोड़ने वाली पत्नी धारा 125(4) के तहत अयोग्य है।
ये फैसले महिलाओं के अधिकारों को संतुलित रखते हैं, लेकिन आलोचना भी हो रही है कि गरीबी को ‘अपर्याप्त’ मानना सामाजिक असमानता को नजरअंदाज करता है।
सामाजिक प्रभाव: बहस छिड़ी
यह फैसला सामाजिक और कानूनी बहस छेड़ रहा है। महिला अधिकार कार्यकर्ता रीता शर्मा ने कहा, “गरीबी क्रूरता का रूप है, इसे पर्याप्त कारण माना जाना चाहिए।” वहीं, फैमिली लॉ एक्सपर्ट ने कहा, “यह फैसला दुरुपयोग रोकता है, लेकिन केस-टू-केस देखना जरूरी।”
यह फैसला महिलाओं को मेंटेनेंस के लिए मजबूत सबूत पेश करने की याद दिलाता है। यदि आप ऐसा केस हैंडल कर रहे हैं, तो वकील से सलाह लें। अधिक जानकारी के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की वेबसाइट चेक करें।
