राजनीति

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: पहले चरण में 8% अधिक वोटिंग के पांच प्रमुख कारण

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: पहले चरण में 8% अधिक वोटिंग के पांच प्रमुख कारण

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 121 सीटों पर गुरुवार को रिकॉर्ड 64.66% वोटिंग दर्ज की गई, जो 2020 के पहले चरण के 56.2% से करीब 8.5% अधिक है। यह राज्य के इतिहास की सबसे ऊंची वोटिंग दर है, जो 2000 के 62.57% के पिछले रिकॉर्ड को तोड़ती है। चुनाव आयोग ने इसे ‘लोकतंत्र की जीत’ बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह एनडीए के पक्ष में उत्साह है या महागठबंधन के खिलाफ असंतोष। विशेषज्ञों के अनुसार, वोटिंग में उछाल के पीछे कई कारक हैं। आइए जानते हैं पांच मुख्य कारणों के बारे में, जो इस बार वोटरों को खींच लाए।

1. विशेष गहन संशोधन (SIR) से साफ-सुथरी वोटर लिस्ट: चुनाव आयोग के विशेष गहन संशोधन अभियान ने वोटर लिस्ट से 47 लाख फर्जी, मृत या डुप्लिकेट नाम हटाए, जिससे कुल मतदाताओं की संख्या में सिर्फ 1.1% की वृद्धि हुई। इससे वास्तविक और सक्रिय वोटरों का अनुपात बढ़ा, जो टर्नआउट को 17.1% ऊपर ले गया। विपक्ष ने इसे ‘वोटर हटाने की साजिश’ कहा था, लेकिन परिणाम उलटे आए—सिर्फ प्रतिबद्ध वोटर ही बूथ पर पहुंचे। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इसे ‘सबसे शुद्ध मतदाता सूची’ बताया।

2. महिलाओं की भारी भागीदारी और जागरूकता अभियान: बिहार में महिलाओं की वोटिंग दर पुरुषों से ऊंची रही, जो कुल पात्र वोटरों का लगभग आधा हिस्सा हैं। जीविका दीदियों के 90,000 स्वयंसहायता समूहों ने घर-घर जाकर महिलाओं को प्रेरित किया। एनडीए की महिला रोजगार योजना के तहत 75 लाख महिलाओं को 880 मिलियन डॉलर की सहायता मिली, जबकि महागठबंधन ने मासिक भत्ता का वादा किया। इससे ग्रामीण महिलाएं बूथों पर उमड़ीं, खासकर मिथिलांचल, कोसी और सारण बेल्ट में।

3. शांतिपूर्ण और सुगम मतदान प्रक्रिया: पहले चरण में कोई बड़ा हिंसा या बाधा नहीं हुई। 45,341 पोलिंग स्टेशनों में 926 महिला-प्रबंधित और 107 दिव्यांग-प्रबंधित बूथ बने, जो वोटरों को सुविधा प्रदान करने वाले थे। सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक वोटिंग चली, और ईसीआई की पारदर्शी व्यवस्था ने विश्वास बढ़ाया। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि 4-5% की वृद्धि जनता की सक्रियता दिखाती है। मिनापुर (73.29%) और बेगूसराय (76%) जैसे क्षेत्रों में ऊंची वोटिंग इसका प्रमाण है।

4. तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और एंटी-इनकंबेंसी मूड: नितीश कुमार का दसवीं बार मुख्यमंत्री बनने का दावा, तेजस्वी यादव की युवा अपील और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की डेब्यू ने त्रिकोणीय मुकाबला बनाया। विपक्ष का दावा है कि 5% से अधिक वोटिंग वृद्धि सरकार बदलाव का संकेत है—जैसे 2005 में 16% गिरावट के बावजूद नितीश सत्ता में आए। पीएम मोदी ने इसे ‘एनडीए समर्थन’ बताया, लेकिन इतिहास कहता है कि ऊंची वोटिंग अक्सर सत्ता परिवर्तन लाती है।

5. सरकारी योजनाओं और विकास के मुद्दों पर उत्साह: रोजगार, विकास और जवाबदेही के मुद्दों ने वोटरों को प्रेरित किया। 85 वर्ष से ऊपर के 2 लाख वरिष्ठ नागरिकों ने वोट डाला। लाड़ली बहन जैसी योजनाओं ने ग्रामीणों को जोड़ा, जबकि माओवादी प्रभावित मुंगेर के भिंबबंध क्षेत्र में 20 साल बाद शांतिपूर्ण वोटिंग हुई। ईसीआई ने इसे ‘उत्सवपूर्ण माहौल’ कहा, जो कुल 3.75 करोड़ वोटरों में से 2.42 करोड़ को बूथ तक लाया।

यह रिकॉर्ड वोटिंग बिहार की राजनीति में बदलाव की आहट दे रही है। दूसरे चरण की 11 नवंबर को मतदान होगा, और 14 नवंबर को नतीजे आएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो राज्य में नया राजनीतिक समीकरण बन सकता है। फिलहाल, सभी दल अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं।

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