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‘बहुत कुछ सहा, हमें बैठने की जगह दिलाएं माइलॉर्ड…’: सुप्रीम कोर्ट में महिला वकीलों की चेंबर मांग पर नोटिस, 15 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं की लड़ाई

‘बहुत कुछ सहा, हमें बैठने की जगह दिलाएं माइलॉर्ड…’: सुप्रीम कोर्ट में महिला वकीलों की चेंबर मांग पर नोटिस, 15 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं की लड़ाई

देशभर की अदालतों और बार काउंसिलों में महिला वकीलों को प्रोफेशनल चैंबर और बैठने की बुनियादी सुविधा देने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सभी हाई कोर्ट्स और बार काउंसिल को नोटिस जारी कर दिया है। याचिका में भावुक अपील की गई है – “हमने बहुत कुछ सहा है, माइलॉर्ड… हमें तो बस बैठने की जगह दिला दें।” यह मांग 15-25 साल पुरानी प्रैक्टिस करने वाली महिला वकीलों की व्यावहारिक समस्याओं को उजागर करती है, जहां वे सीनियर वकीलों के चैंबर में ही काम करने को मजबूर हैं। सुप्रीम कोर्ट महिला वकील संघ की उपाध्यक्ष एडवोकेट भक्ति पासरिजा द्वारा दायर इस PIL पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने तत्काल कार्रवाई का आदेश दिया।

मांग का बैकग्राउंड: 15 साल की प्रैक्टिस के बाद भी ‘बैठने की जगह’ नहीं

– याचिका का सार: याचिकाकर्ताओं ने बताया कि देश की 80% से ज्यादा महिला वकील (कुल 2 लाख से अधिक) को अलग चैंबर, कॉमन रूम या पार्किंग जैसी बेसिक सुविधाएं नहीं मिलतीं। इससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है, और वे पुरुष वकीलों के चैंबर में ही फाइलें रखने या क्लाइंट से मिलने को मजबूर रहती हैं। एडवोकेट प्रेरणा ने कहा, “इतने सालों की प्रैक्टिस के बाद भी हमें अपनी जगह नहीं मिलती। यह लैंगिक असमानता है।”

– प्रभाव: गाजीपुर, मथुरा जैसे जिलों में पहले भी इसी मुद्दे पर विवाद हुए हैं, जहां महिला वकीलों ने वॉशरूम और कॉमन रूम की कमी पर हल्ला बोला। मथुरा कलेक्ट्रेट में तो चैंबर विवाद मारपीट तक पहुंच गया था। याचिका में मांग की गई है कि हर कोर्ट कैंपस में 30% चैंबर महिलाओं के लिए आरक्षित हों।

– सुप्रीम कोर्ट का रुख: कोर्ट ने नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब मांगा है। CJI ने कहा, “यह महिला सशक्तिकरण का सवाल है। बराबरी की जगह पहले मिले, तभी बराबरी की बात हो।” सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा नियमों में वकीलों के चैंबर आवंटन के संशोधित दिशानिर्देश हैं, लेकिन ये लिंग-आधारित नहीं हैं।

महिला वकीलों की आवाज: ‘हमारी लड़ाई अब अदालतों में बराबरी की जगह की’

– व्यावहारिक दिक्कतें: एडवोकेट भक्ति पासरिजा ने बताया, “सीनियर वकीलों के चैंबर में काम करना पड़ता है, जहां गोपनीयता और सुविधा का अभाव है। लंच के लिए भी जगह तलाशनी पड़ती है।” गाजीपुर कोर्ट में महिला वकीलों ने पार्किंग और सुरक्षा की भी शिकायत की थी।

– बढ़ती संख्या: बार काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, महिला वकीलों की संख्या 2010 से दोगुनी हो चुकी है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर वही पुराना है। याचिका में सुझाव दिया गया कि केंद्र सरकार ‘महिला वकील सुविधा फंड’ बनाए।

– समर्थन: ऑल इंडिया वुमन लॉयर्स एसोसिएशन ने इसे ‘वुमन एम्पावरमेंट 2.0’ बताया। पूर्व CJI आरएम लोढ़ा ने ट्वीट कर कहा, “यह समय की मांग है।”

यह याचिका न केवल चैंबर की मांग है, बल्कि न्याय व्यवस्था में लैंगिक समानता की बड़ी लड़ाई का प्रतीक है। सुनवाई की अगली तारीख 17 नवंबर है।

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