बंगाल में सत्ता परिवर्तन: भवानीपुर में क्यों नहीं चला ममता का जादू? ये हैं वो 5 फैक्टर्स जिन्होंने डूबा दी टीएमसी की नैया
बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया है। सबसे बड़ा उलटफेर कोलकाता की हाई-प्रोफाइल सीट भवानीपुर में हुआ है, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके ही पुराने सहयोगी और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने 15,105 वोटों के अंतर से हरा दिया है।
ममता बनर्जी की इस हार और भवानीपुर के ‘सेफ किले’ के ढहने के पीछे ये 5 सबसे प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं:
1. शुभेंदु अधिकारी का ‘जायंट किलर’ प्रभाव
शुभेंदु अधिकारी ने 2021 में नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराने के बाद, अब 2026 में उनके घर भवानीपुर में घुसकर मात दी है। उन्होंने पूरे चुनाव को ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ के बजाय ‘भ्रष्टाचार बनाम विकास’ पर केंद्रित कर दिया। शुभेंदु ने भवानीपुर के हिंदी भाषी और मिश्रित मतदाताओं के बीच ‘हिंदुत्व’ और ‘परिवर्तन’ के नैरेटिव को मजबूती से रखा, जो अंततः निर्णायक साबित हुआ।
2. मतदाता सूची से नामों का कटना (SIR मुद्दा)
चुनाव से पहले चुनाव आयोग द्वारा किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत भवानीपुर सीट से लगभग 41,000 नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि इनमें से अधिकांश उनके कोर वोटर (अल्पसंख्यक और महिलाएं) थे। आंकड़ों के अनुसार, हटाए गए नामों में एक बड़ा हिस्सा उन समुदायों का था जो पारंपरिक रूप से टीएमसी को वोट देते रहे हैं। इस कटौती ने जीत के मार्जिन को पूरी तरह से पलट दिया।
3. भ्रष्टाचार के आरोपों और घोटालों की गूंज
पिछले दो सालों में टीएमसी सरकार के कई मंत्रियों और नेताओं का भ्रष्टाचार के मामलों (जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला) में जेल जाना शहरी मतदाताओं के बीच गहरी नाराजगी का कारण बना। भवानीपुर जैसे शिक्षित और मध्यम वर्गीय क्षेत्र में इन घोटालों और केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) की कार्रवाई ने ममता बनर्जी की ‘ईमानदार छवि’ पर सवाल खड़े किए, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला।
4. आर.जी. कर कांड और महिला सुरक्षा की नाराजगी
कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में हुई घटना ने पूरे बंगाल, खासकर कोलकाता के मतदाताओं के गुस्से को चरम पर पहुँचा दिया था। “दीदी” को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानने वाली महिलाओं के एक वर्ग में इस घटना के बाद असुरक्षा का भाव पैदा हुआ। विपक्ष ने इस मुद्दे को भुनाते हुए सरकार पर सुरक्षा के मोर्चे पर विफल होने का आरोप लगाया, जिससे टीएमसी के महिला वोट बैंक में बड़ी सेंध लगी।
5. प्रचंड ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ और भाजपा की लहर
15 साल के लगातार शासन के बाद जनता के बीच बदलाव की तीव्र इच्छा देखी गई। भाजपा ने पूरे बंगाल में 207 सीटें जीतकर जो ‘भगवा सुनामी’ पैदा की, उससे भवानीपुर जैसा गढ़ भी अछूता नहीं रहा। युवा मतदाताओं में रोजगार की कमी और स्थानीय स्तर पर टीएमसी कार्यकर्ताओं की ‘सिंडिकेट राज’ वाली छवि ने मतदाताओं को भाजपा की ओर धकेल दिया।
ताजा अपडेट:
नतीजों के बाद ममता बनर्जी ने इसे “जनादेश का अपहरण” और “शक्ति का दुरुपयोग” बताया है। वहीं, शुभेंदु अधिकारी ने इस जीत को ‘लोकतंत्र और हिंदुत्व की जीत’ करार दिया है। टीएमसी अब 80 सीटों पर सिमटकर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में होगी, जबकि भाजपा पहली बार बंगाल में अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है।
