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किसी कीमत पर बगराम एयरबेस नहीं देंगे…’: भारत की धरती से तालिबानी मंत्री की ट्रंप को दो टूक

‘किसी कीमत पर बगराम एयरबेस नहीं देंगे…’: भारत की धरती से तालिबानी मंत्री की ट्रंप को दो टूक

अफगानिस्तान के तालिबान शासन के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी ने भारत दौरे के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को साफ लफ्जों में ललकारा है। सात दिनों के ऐतिहासिक दौरे पर भारत पहुंचे मुत्तकी ने कहा, “अफगानिस्तान की किसी भी इंच जमीन पर किसी भी कीमत पर विदेशी सैन्य उपस्थिति स्वीकार नहीं की जाएगी। बगराम एयरबेस सहित कोई भी सैन्य ढांचा अमेरिका को नहीं सौंपा जाएगा।” यह बयान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक के बाद नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया, जो क्षेत्रीय भू-राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हो रहा है।

ट्रंप की जिद और तालिबान का करारा जवाब

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सितंबर 2025 में ब्रिटेन के दौरे के दौरान ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए धमकी दी थी, “अगर अफगानिस्तान ने बगराम एयरबेस हमें वापस नहीं दिया, जिसे हमने बनाया था, तो बहुत बुरे अंजाम होंगे!” ट्रंप का तर्क था कि यह एयरबेस चीन के परमाणु हथियार उत्पादन केंद्रों से महज एक घंटे की दूरी पर है, जो अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन तालिबान ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के अधिकारी जाकिर जलाल ने एक्स पर लिखा, “अफगानिस्तान की संप्रभुता अटल है। विदेशी सैन्य उपस्थिति का विचार पूरी तरह अस्वीकार्य है।”

बगराम एयरबेस अफगानिस्तान का सबसे बड़ा सैन्य हवाई अड्डा है, जो काबुल से 50 किलोमीटर उत्तर में परवान प्रांत में स्थित है। अमेरिका ने 2001 में तालिबान को उखाड़ फेंकने के बाद इसे अपना मुख्यालय बनाया था। 2021 में अमेरिकी वापसी के दौरान यह तालिबान के हाथ लग गया। अब ट्रंप की इस मांग ने न केवल तालिबान को भड़का दिया है, बल्कि क्षेत्रीय शक्तियों को भी एकजुट कर दिया है।

भारत का रुख: तालिबान के साथ खड़े, ट्रंप के खिलाफ

भारत ने इस मुद्दे पर तालिबान का खुला समर्थन किया है। मॉस्को में 7 अक्टूबर को आयोजित ‘मॉस्को फॉर्मेट कंसल्टेशंस’ की सातवीं बैठक में भारत, पाकिस्तान, चीन, रूस, ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने संयुक्त बयान जारी कर अफगानिस्तान में विदेशी सैन्य ढांचे की स्थापना को “अस्वीकार्य” बताया। भारत के राजदूत विनय कुमार ने बैठक में हिस्सा लिया और स्पष्ट किया कि ऐसी किसी भी कोशिश से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी।

यह भारत की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। लंबे समय से तालिबान को पाकिस्तान का प्रॉक्सी मानने वाले भारत ने हाल के वर्षों में अफगानिस्तान में मानवीय और विकास सहायता बढ़ाई है। मुत्तकी का यह पहला भारत दौरा है, जो तालिबान के किसी वरिष्ठ अधिकारी के लिए ऐतिहासिक है। जयशंकर से मुलाकात में दोनों पक्षों ने आतंकवाद विरोधी सहयोग, आर्थिक सहायता और क्षेत्रीय स्थिरता पर चर्चा की। मुत्तकी ने कहा, “भारत के साथ हमारी बातचीत सार्थक और भविष्योन्मुखी रही। हम अफगानिस्तान में शांति और विकास चाहते हैं, न कि बाहरी हस्तक्षेप।”

क्षेत्रीय एकजुटता: दुश्मन भी एक साथ

ट्रंप की इस “गैंबिट” ने अप्रत्याशित रूप से भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों को एक मंच पर ला खड़ा किया है। पाकिस्तान ने भी मॉस्को बयान का समर्थन किया, जबकि चीन ने इसे “क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन” बताया। रूस ने इसे “अमेरिकी साम्राज्यवाद की वापसी” करार दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह एकता अफगानिस्तान को अमेरिकी प्रभाव से मुक्त रखने की रणनीति है। ORF के कबीर तनेजा ने विश्लेषण में कहा, “ट्रंप का बगराम दांव अफगानिस्तान को वैश्विक रणनीति के केंद्र में वापस धकेल रहा है, लेकिन पड़ोसी देश इससे निपटने को तैयार हैं।”

भविष्य की संभावनाएं: क्या होगा अगला कदम?

मुत्तकी का भारत दौरा 16 अक्टूबर तक चलेगा, जिसमें दिल्ली के अलावा मुंबई और चेन्नई भी शामिल हैं। भारत ने तालिबान को मान्यता न देने की नीति बरकरार रखी है, लेकिन व्यावहारिक सहयोग बढ़ा रहा है। ट्रंप की धमकी के बावजूद, अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि कोई सैन्य कार्रवाई की योजना नहीं है। फिर भी, अफगान सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलीं कि अमेरिकी सैनिक बगराम लौट आए हैं, जिसे पेंटागॉन ने “पूरी तरह बेबुनियाद” बताया।

यह घटनाक्रम न केवल अफगानिस्तान की संप्रभुता का सवाल है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को नया आकार दे रहा है। यदि ट्रंप अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो क्षेत्रीय गठबंधन और मजबूत हो सकता है। तालिबान का संदेश साफ है: “अफगानिस्तान की जमीन किसी कीमत पर नहीं बिकेगी।”

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